नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में विजय कुमार राजपूत उर्फ विज्जू के खिलाफ जारी जिला बदर आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य सुरक्षा अधिनियम, 1990 के तहत जिला बदर की कार्रवाई से पहले संबंधित व्यक्ति को नोटिस देकर आरोपों की जानकारी और अपना पक्ष रखने का अवसर देना अनिवार्य है। बिना इस प्रक्रिया का पालन किए पारित आदेश कानून की नजर में अमान्य है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने दिए फैसले में कहा कि जिला बदर का आदेश नागरिक की आवागमन की मौलिक स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। इसलिए प्रशासन को इस असाधारण शक्ति का उपयोग बेहद सावधानी से करना होगा। मामले की शुरुआत 2019 में हुई थी, रायगढ़ के पुलिस अधीक्षक ने विजय कुमार के खिलाफ 2009 से 2019 के बीच दर्ज दस आपराधिक मामलों के आधार पर जिला बदर की कार्रवाई शुरू करने की अनुशंसा की थी।
जिला मजिस्ट्रेट ने बाद में कार्रवाई शुरू की, लेकिन विजय कुमार के बरी होने और 2019 के बाद कोई नई पुलिस रिपोर्ट न आने के कारण 6 अक्टूबर 2025 को जिला बदर की कार्रवाई बंद कर दी गई।
नया अपराध दर्ज होते पुरानी फाइल खोल की कार्रवाई
हालांकि, 2023 में एक मामले को हाई कोर्ट ने निरस्त कर दिया और 30 अक्टूबर 2025 को विजय कुमार के खिलाफ एक नया अपराध दर्ज हुआ। इसके बाद पुलिस अधीक्षक ने 3 नवंबर 2025 को नई रिपोर्ट पेश की, जिसके आधार पर पहले बंद की गई जिला बदर कार्रवाई को दोबारा खोलते हुए 4 नवंबर 2025 को विजय कुमार को एक वर्ष के लिए रायगढ़ और आसपास के जिलों से बाहर रहने का आदेश दिया गया।
नोटिस न ही पक्ष रखने का मौका दिया, यह गलत
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विजय कुमार को दोबारा शुरू की गई जिला बदर कार्रवाई के समय कोई नोटिस नहीं दिया गया और उसे अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि जिला बदर आदेश से पहले संबंधित व्यक्ति को आरोपों की सामान्य प्रकृति बताना और उचित अवसर देना अनिवार्य है। केवल कानून में निर्धारित सीमित परिस्थितियों में ही एकतरफा कार्रवाई की जा सकती है।
नए सिरे से कार्रवाई जरूरी थी तो कानूनी प्रक्रिया अपनानी थी
कोर्ट ने यह भी कहा कि जिला मजिस्ट्रेट ने 6 अक्टूबर 2025 को जिला बदर की कार्रवाई बंद कर दी थी और अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत जिला मजिस्ट्रेट को अपने ही आदेश की समीक्षा करने का अधिकार हो। पीठ ने कहा कि यदि नए सिरे से कार्रवाई आवश्यक थी, तो कानून के अनुसार प्रक्रिया अपनानी थी।
कई मामले दर्ज होना मात्र जिला बदर का आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज होना मात्र जिला बदर का आधार नहीं हो सकता। जिला मजिस्ट्रेट को वस्तुनिष्ठ सामग्री के आधार पर संतुष्टि दर्ज करनी होगी कि संबंधित व्यक्ति की गतिविधियां लोगों या संपत्ति के लिए खतरा पैदा कर रही हैं।
कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें विजय कुमार की रिट याचिका को वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के आधार पर खारिज किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब किसी आदेश में प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हुआ हो, तब केवल वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के आधार पर हाई कोर्ट अपनी रिट अधिकारिता का इस्तेमाल करने से इनकार नहीं कर सकता।
जिला बदर आदेश किया रद
अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने विजय कुमार के खिलाफ जारी जिला बदर आदेश और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के आदेश दोनों को निरस्त कर दिया। उसे उन जिलों में प्रवेश करने की स्वतंत्रता दे दी गई, जहां से उसे बाहर रहने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले में की गई टिप्पणियों को विजय कुमार के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के गुण-दोष पर कोई निष्कर्ष नहीं माना जाएगा।