
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के लिए विद्युतीकरण का काम पूरा करने के बाद अंतिम भुगतान पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे नागपुर के ठेकेदार को हाई कोर्ट से भी राहत नहीं मिली। रेलवे ने करीब 41.63 लाख रुपये का अंतिम भुगतान इसलिए रोक दिया था, क्योंकि ठेकेदार आपूर्ति किए गए गैल्वनाइज्ड मास्ट को रेलवे के अनुमोदित स्रोत से खरीदने का जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने मध्यस्थ के फैसले और वाणिज्यिक अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए ठेकेदार की अपील खारिज कर दी।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पार्थ प्रीतम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की पीठ ने यह फैसला एमएस तेजा इलेक्ट्रिकल्स, नागपुर के प्रोपराइटर राजेश तेजवानी की ओर से दायर मध्यस्थता अपील में सुनाया। आदेश 13 अक्टूबर को सुरक्षित रखा गया था और 30 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया।
रेलवे ने 3 जून 2005 को कोटारलिया में इंड एग्रो सिनेर्जी लिमिटेड की निजी रेल साइडिंग के विद्युतीकरण के लिए निविदा जारी की थी। ठेका मिलने के बाद 5 अक्टूबर 2005 को समझौता हुआ। ठेकेदार ने 14 मई 2006 को काम पूरा कर दिया। रेलवे ने 25 जनवरी 2007 को काम संतोषजनक ढंग से पूरा होने का प्रमाणपत्र भी जारी किया। ठेकेदार ने 1.49 करोड़ रुपये का अंतिम बिल प्रस्तुत किया था।
पहले किए गए भुगतान को घटाने के बाद 41,63,602 रुपये शेष थे। रेलवे ने गैल्वनाइज्ड मास्ट के निर्माता का परीक्षण प्रमाणपत्र और मूल आपूर्तिकर्ता चालान मांगा। ठेकेदार ने रायपुर की यूनिक स्ट्रक्चर एंड टावर लिमिटेड की परीक्षण रिपोर्ट दी। जांच में रेलवे ने पाया कि इस कंपनी ने मास्ट का निर्माण नहीं किया था, बल्कि केवल उस पर गैल्वनाइजिंग की थी। रेलवे के अनुसार, सामग्री के वास्तविक निर्माता और अनुमोदित स्रोत से खरीद का प्रमाण भी नहीं दिया गया। इसी आधार पर अंतिम भुगतान रोक दिया गया।
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ठेकेदार की ओर से कहा गया कि सामग्री की जांच रेलवे की ओर से अधिकृत संस्था राइट्स ने की थी। यूनिक स्ट्रक्चर एंड टावर ने अपनी परीक्षण रिपोर्ट की पुष्टि भी की थी। ठेकेदार ने दावा किया कि सामग्री अनुमोदित स्रोतों से खरीदी गई थी और रेलवे ने इसी तरह के प्रमाणपत्रों के आधार पर पहले 85 प्रतिशत भुगतान भी कर दिया था। उसका तर्क था कि काम पूरा होने का प्रमाणपत्र जारी होने के बाद शेष भुगतान रोकना उचित नहीं है।
रेलवे की ओर से जवाब दिया गया कि अनुबंध की विशेष शर्त के अनुसार सामग्री आरडीएसओ/कोर से अनुमोदित स्रोतों से खरीदना, निरीक्षण प्रमाणपत्र और आपूर्तिकर्ता का मूल चालान प्रस्तुत करना अनिवार्य था। गैल्वनाइजिंग करने वाली कंपनी की रिपोर्ट से यह साबित नहीं होता कि मास्ट का निर्माण भी किसी अनुमोदित स्रोत ने किया था। पहले किया गया अंतरिम भुगतान अंतिम भुगतान की शर्तों से छूट नहीं देता।
पीठ ने पाया कि अनुबंध की विशेष शर्त संख्या तीन में सामग्री की खरीद अनुमोदित स्रोतों से करने की स्पष्ट बाध्यता थी। ठेकेदार ने जिस कंपनी की परीक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत की, वह मास्ट की निर्माता नहीं, बल्कि गैल्वनाइजिंग करने वाली कंपनी थी। ठेकेदार ने वास्तविक निर्माता और सामग्री की खरीद के स्रोत को प्रमाणित करने वाला जरूरी दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किया। अदालत ने कहा कि केवल निरीक्षण प्रमाणपत्र या बाद में मिले पत्राचार से अनुबंध में निर्धारित दस्तावेजी शर्त पूरी नहीं मानी जा सकती। पहले 85 प्रतिशत भुगतान हो जाने से रेलवे की ओर से शेष भुगतान की अनिवार्य शर्तों को छोड़ देने की सहमति भी नहीं मानी जा सकती।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मध्यस्थता कानून की धारा 37 के तहत अपील में अदालत का अधिकार सीमित है। वह मध्यस्थ के निष्कर्षों और साक्ष्यों का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं कर सकती, जब तक फैसला मनमाना, विकृत, कानून के विरुद्ध या ऐसी स्पष्ट अवैधता से प्रभावित न हो जो मामले की जड़ तक जाती हो। अदालत को मध्यस्थ का निष्कर्ष अनुबंध की शर्तों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर संभव लगा। इसलिए अपील खारिज कर दी गई।