कानून से हट चुकी धारा के आधार पर जमीन का डायवर्सन आदेश छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने किया रद
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वर्ष 2012 में ही कानून से हट चुकी भू-राजस्व संहिता की धारा 237(2) के आधार पर वर्ष 2020 में दिए गए जमीन के डायवर्सन आदेशों को रद्द कर दिया है। अदालत ने इसे कानूनी रूप से अवैध करार देते हुए नए सिरे से कार्रवाई करने की छूट दी है।
Publish Date: Mon, 07 Sep 2026 04:13:58 PM (IST)Updated Date: Mon, 07 Sep 2026 04:13:58 PM (IST)
प्रतीकात्मक चित्रHighLights
- मस्तूरी क्षेत्र से जुड़े जमीन डायवर्सन मामले में अदालत की कड़ी टिप्पणी।
- भू-राजस्व संहिता की धारा 237 (2) वर्ष 2012 में ही हो चुकी थी विलोपित।
- कानूनी खामियों के बीच नए सिरे से वैधानिक कार्रवाई करने की दी गई है पूरी छूट।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुरः छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बिलासपुर जिले में जमीन के वाणिज्यिक उपयोग के लिए जारी डायवर्सन आदेशों को रद कर दिया है। यह आदेश अतिरिक्त कलेक्टर द्वारा 29 और 30 जून 2020 को पारित किए गए थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस वैधानिक प्रावधान के आधार पर आदेश पारित किया गया, वह 16 जनवरी 2012 से कानून से विलोपित हो चुका था।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने कहा कि ऐसे प्रविधान के आधार पर पारित आदेश को लागू कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ताओं में एके इन्फ्राडील प्राइवेट लिमिटेड के निशांत खंडेलवाल और सनफ्लावर हाउसिंग प्राइवेट लिमिटेड के अमित अग्रवाल शामिल थे। उन्होंने कलेक्टर, अतिरिक्त कलेक्टर और एसडीओ (राजस्व) मस्तूरी के खिलाफ याचिका दायर की थी।
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बिना प्रविधान आदेश का अधिकार नहीं
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा कि जब संबंधित वैधानिक प्रविधान ही प्रभावी नहीं था, तब अतिरिक्त कलेक्टर को भूमि डायवर्सन का आदेश पारित करने का अधिकार नहीं था। राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता डा. सौरभ कुमार पांडेय ने आदेश का बचाव किया, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि धारा 237(2) 16 जनवरी 2012 से विलोपित हो चुकी थी।
कोर्ट ने कहा कि खत्म हो चुकी धारा के आधार पर आदेश कैसे वैध होगा। हाई कोर्ट ने दोनों आदेशों को निरस्त करते हुए नए सिरे से कार्रवाई की छूट दी है। हालांकि, कोर्ट ने भूमि के वाणिज्यिक उपयोग या डायवर्जन के मूल अधिकार पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।