नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पत्नी पर मानसिक क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाकर तलाक मांगने वाले जगदलपुर निवासी संजीव गुरुवारा की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि पति अपने आरोपों को ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका। साक्ष्यों से यह भी सामने आया कि पति स्वयं अलग रहने लगा था, जबकि पत्नी वैवाहिक संबंध बनाए रखने और साथ रहने की इच्छा जता रही थी।
न्यायमूर्ति पार्थ प्रीतम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की खंडपीठ ने 13 अक्टूबर को फैसला सुनाते हुए परिवार न्यायालय, जगदलपुर के तलाक देने से इन्कार करने के आदेश को बरकरार रखा। जगदलपुर के इंदिरा वार्ड निवासी संजीव गुरुवारा, पिता सत्यपाल गुरुवारा, की शादी पूर्णिमा खरे गुरुवारा उर्फ हेमा खरे गुरुवारा से सात जुलाई 1992 को हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। दंपती के तीन बच्चे हैं।
पति ने परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी देते हुए आरोप लगाया था कि शादी के कुछ समय बाद ही पत्नी का व्यवहार बदल गया। वह अपमानित करती थी, वैवाहिक संबंध बनाने से इनकार करती थी और झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी देती थी।
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पति का कहना था कि पत्नी के व्यवहार और उपेक्षा के कारण उसे जुलाई 2018 से अपना घर छोड़कर होटल में रहना पड़ा। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने उसकी बीमारी के दौरान देखभाल नहीं की और बच्चों को उसके खिलाफ प्रभावित किया। दोनों ने पहले आपसी सहमति से तलाक की अर्जी भी दी थी, लेकिन पत्नी ने बाद में विवाह खत्म करने की सहमति नहीं दी।
पत्नी ने आरोपों को नकारा
पत्नी ने परिवार न्यायालय में आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि उसने पति के साथ क्रूरता नहीं की और न ही उसे छोड़ा। उसका आरोप था कि पति स्वयं घर छोड़कर अलग रहने लगा था। उसने पति पर पत्नी और बच्चों के साथ हिंसक व्यवहार करने का आरोप भी लगाया।
पत्नी ने कहा कि वह वैवाहिक संबंध बनाए रखना चाहती है। परिवार न्यायालय ने साक्ष्यों के आधार पर पति के आरोप साबित नहीं पाए और आठ दिसंबर 2023 को तलाक की अर्जी खारिज कर दी। इसके खिलाफ पति ने हाई कोर्ट में अपील की।
बच्चों की गवाही भी पति के दावे के विपरीत
हाई कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने वैवाहिक संबंध बनाने से इनकार करने, धमकी देने और प्रताड़ित करने के आरोपों को लगातार नकारा। जिरह के दौरान उसके बयान को गलत साबित करने वाला कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया। पति झूठी शिकायत दर्ज कराने और बच्चों को अपने खिलाफ करने के आरोप भी साबित नहीं कर सका।
डिवीजन बेंच ने पति की बेटी और बेटे की गवाही का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों ने बताया था कि उनके पिता अक्सर घर आते थे और परिवार के साथ भोजन भी करते थे। बच्चों ने इस दावे का भी समर्थन नहीं किया कि माता-पिता के बीच लंबे समय से विवाद के कारण पिता वर्ष 2011 से लगातार अलग रह रहे थे।
अलग रहना अपने आप में तलाक का आधार नहीं
अदालत ने कहा कि लंबे समय तक अलग रहने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पत्नी ने पति का परित्याग किया है। परित्याग साबित करने के लिए अलग रहने के साथ वैवाहिक संबंध स्थायी रूप से खत्म करने की मंशा भी प्रमाणित होनी चाहिए। इसी तरह, वैवाहिक संबंध बनाने से लगातार और बिना उचित कारण इनकार करना मानसिक क्रूरता हो सकता है, लेकिन इसके लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।
बेंच ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में सामान्य मतभेद, झगड़े और घरेलू मामलों को लेकर असहमति अपने आप में तलाक के लिए मानसिक क्रूरता नहीं माने जा सकते। केवल आपसी सहमति से तलाक की पूर्व कार्यवाही में पत्नी का बाद में सहमति वापस लेना भी क्रूरता या परित्याग साबित नहीं करता।
अदालत ने कहा कि पति क्रूरता और परित्याग, दोनों आधारों को प्रमाणित करने में विफल रहा। इसलिए अपील खारिज करते हुए परिवार न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा गया।