
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। सत्र न्यायालय ने यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों और शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। न्यायालय के एकादश अपर सत्र न्यायाधीश विजेन्द्र सोनवानी की अदालत ने कहा है कि यदि यातायात पुलिस किसी वाहन को मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 207 के तहत ''''निरुद्ध'''' (डिटेन, थाने में खड़ा) करती है, तो उसे कोर्ट से सुपुर्दनामे पर नहीं छुड़ाया जा सकता। ऐसी गाड़ियों को छुड़ाने के लिए मालिक को केवल परिवहन प्राधिकरण (आरटीओ) या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत अधिकारी के पास ही आवेदन करना होगा।
अदालत ने जप्तशुदा और निरुद्ध किए गए वाहनों के बीच का विधिक अंतर स्पष्ट करते हुए आरोपी आशुतोष कुमार थवाईत की पुनरीक्षण याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है। मामला सिटी कोतवाली थाना क्षेत्र का है। जूना बिलासपुर गुरुद्वारे के पास के रहने वाले आशुतोष कुमार थवाईत पिता गजानंद थवाईत को ट्रैफिक पुलिस ने पकड़ा था।
आरोपित के खिलाफ मोटर यान अधिनियम की धारा 185 (शराब पीकर वाहन चलाना) और धारा 3/181 (बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस के वाहन चलाना) के तहत अपराध दर्ज किया गया था। इस कार्रवाई के दौरान पुलिस ने उसकी मोटरसाइकिल सीजी 10 ए डब्ल्यू 4909 को धारा 207 के तहत निरुद्ध (डिटेन) कर ट्रैफिक थाने में खड़ा करवा दिया था। आरोपित ने अपनी मोटरसाइकिल को छुड़ाने के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 503 के तहत सुपुर्दनामा आवेदन लगाया था, जिसे सीजेएम कोर्ट ने 25 अप्रैल 2026 को खारिज कर दिया था। इसके बाद आरोपी ने सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
मशीनरी है कबाड़ हो जाने का दिया तर्क
आरोपी पक्ष के अधिवक्ता रोहित हंसपाल ने अदालत में कहा कि जब्त मोटरसाइकिल लंबे समय तक थाने में खुले में खड़ी रहने से खराब होकर कबाड़ बन सकती है। उन्होंने वाहन को सुपुर्दगी पर देने की मांग करते हुए भरोसा दिलाया कि केस के अंतिम निर्णय तक वाहन का स्वरूप नहीं बदला जाएगा, न बेचा जाएगा और न गिरवी रखा जाएगा। वहीं, राज्य पक्ष ने निचली अदालत के आदेश को वैध बताते हुए याचिका खारिज करने की मांग की।
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यह कहती है मोटर यान अधिनियम की धारा 207
सत्र न्यायालय ने ट्रैफिक पुलिस के इश्तगासे और केस डायरी का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि पुलिस ने वाहन का ''''जब्ती पत्रक'''' तैयार नहीं किया था, बल्कि गाड़ी को सीधे धारा 207 के तहत पुलिस लाइन/थाने में डिटेन किया था। कोर्ट ने अपने आदेश में एमवी एक्ट की धारा 207(2) के कानूनी प्रावधानों को रेखांकित किया। एक्ट के तहत जब कोई मोटर वाहन उपधारा (1) के अधीन अभिगृहीत और निरुद्ध किया गया है, तब उस मोटर वाहन का स्वामी उसे विमुक्त कराने के लिए सुसंगत दस्तावेजों के साथ परिवहन प्राधिकारी या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी को आवेदन कर सकेगा, जो दस्तावेजों के सत्यापन के बाद गाड़ी छोड़ने का आदेश दे सकेगा।
इसलिए कोर्ट ने खारिज की याचिका
एकादश अपर सत्र न्यायाधीश ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में लिखा कि ट्रैफिक पुलिस ने वाहन को सामान्य अपराध की तरह जब्त नहीं किया था, बल्कि एमवी एक्ट की धारा 207 के तहत निरुद्ध किया था, इसलिए विचारण न्यायालय के पास इस वाहन को सुपुर्दनामे पर देने का कोई विधिक अधिकार ही नहीं है। जब निचली अदालत के पास क्षेत्राधिकार ही नहीं था, तो उसके द्वारा 25 अप्रैल 2026 को आवेदन निरस्त करने के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि या अवैधता नहीं है।सत्र न्यायालय ने आरोपी की पुनरीक्षण याचिका को पूरी तरह से आधारहीन और सारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
कोर्ट ने यह अंतिम आदेश जारी किया
सत्र न्यायालय ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की पुष्टि करते हुए मामले को निपटा दिया है। कोर्ट ने आदेश की एक प्रति के साथ मूल केस डायरी को निचली अदालत भेजने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, संबंधित थाना प्रभारी (यातायात) को भी केस डायरी के साथ आदेश की कॉपी भेजी गई है ताकि आवश्यक कानूनी कार्रवाई पूरी की जा सके। इस आदेश के बाद अब आरोपी को अपनी गाड़ी छुड़ाने के लिए कोर्ट के चक्कर काटने के बजाय सीधे परिवहन विभाग के समक्ष ही गुहार लगानी होगी।