छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का कड़ा रुख: जगदलपुर के डॉक्टर के खिलाफ चलेगा भ्रष्टाचार का मुकदमा, 57 लाख से अधिक की संपत्ति का है मामला
कोर्ट ने 13 साल की जांच में देरी और रिश्तेदारों की संपत्ति को जोड़ने की दलील को खारिज करते हुए विशेष न्यायालय द्वारा आरोप तय किए जाने के आदेश को बरकरार रखा है।
Publish Date: Wed, 28 Oct 2026 07:40:04 PM (IST)Updated Date: Wed, 28 Oct 2026 07:40:04 PM (IST)
HighLights
- पशु चिकित्सक डॉ. नारायण प्रसाद पांडेय को हाईकोर्ट से राहत नहीं।
- आय से अधिक संपत्ति मामले में आरोप तय करने का आदेश बरकरार।
- 13 साल की देरी और रिश्तेदारों की संपत्ति का तर्क खारिज।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोपों का सामना कर रहे जगदलपुर में पदस्थ सहायक पशु चिकित्सा शल्यज्ञ डॉ. नारायण प्रसाद पांडेय को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने विशेष न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप तय करने के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा कि जांच में जुटाए गए साक्ष्य इतने कमजोर या अविश्वसनीय नहीं हैं कि आरोप तय करने के आदेश में हस्तक्षेप किया जाए। अब मामले का विचारण जारी रहेगा। डॉ. पांडेय ने जगदलपुर स्थित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विशेष न्यायाधीश के 30 नवंबर 2019 के आदेश को चुनौती दी थी।
विशेष न्यायालय ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(e) और 13(2) के तहत आरोप तय किए थे। अभियोजन के अनुसार, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को सूचना मिली थी कि डॉ. पांडेय ने अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक चल-अचल संपत्ति अर्जित की है। दो मई 2005 को प्रारंभिक जांच के बाद तीन मई को तलाशी वारंट लिया गया और चार मई को जगदलपुर तथा रायपुर स्थित उनके आवासों की तलाशी ली गई।
आवासों से मिली चल-अचल संपत्ति मूल्य लगभग 57.84 लाख
तलाशी के दौरान जगदलपुर के घर से करीब 8.97 लाख रुपये नकद, सोने-चांदी के आभूषण और अन्य संपत्ति मिली। दोनों आवासों से मिली चल-अचल संपत्ति का कुल मूल्य लगभग 57.84 लाख रुपये आंका गया। इसके बाद आठ मई 2005 को अपराध दर्ज किया गया और 29 नवंबर 2018 को आरोपपत्र पेश किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि संपत्तियों का मूल्य वास्तविक खरीद मूल्य के बजाय बढ़ाकर आंका गया। कुछ संपत्तियां रिश्तेदारों की स्वतंत्र आय से खरीदी गई थीं, लेकिन जांच एजेंसी ने उन्हें भी डॉ. पांडेय की संपत्ति में जोड़ दिया। आयकर विवरणियों और अन्य सरकारी दस्तावेजों पर भी उचित विचार नहीं किया गया।
बचाव पक्ष ने जांच पूरी करने में 13 साल से अधिक की देरी को भी कार्यवाही निरस्त करने का आधार बताया। राज्य शासन ने इसका विरोध करते हुए कहा कि तलाशी और जांच में ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनसे प्रथम दृष्टया आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला बनता है। देरी के संबंध में राज्य ने बताया कि जांच के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से विभिन्न न्यायिक कार्यवाहियां की गईं और अंतरिम संरक्षण भी मिला था।
आरोप तय करने के चरण में अंतिम फैसला नहीं
हाई कोर्ट ने कहा कि संपत्तियों के वैध स्रोत, रिश्तेदारों की आय और संपत्ति के मूल्य से जुड़े सवालों का परीक्षण विचारण के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा। आरोप तय करते समय अदालत को यह तय नहीं करना होता कि अभियुक्त दोषी है या नहीं, बल्कि यह देखना होता है कि अभियोजन सामग्री प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने का आधार देती है या नहीं।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा
भ्रष्टाचार के मामलों में जांच और अभियोजन में हस्तक्षेप केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाना चाहिए। इस मामले में ऐसी स्थिति नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल आरोप तय करने के आदेश की समीक्षा तक सीमित हैं और विचारण न्यायालय को अंतिम निर्णय साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से करना होगा।