16 साल से 'पहाड़ी मैना' है राजपक्षी, लेकिन अब जंगलों में भी नहीं दिखती, ये है कारण
विडंबना यह है कि पिंजरे में रखी मैना नर है या मादा? यह वन विभाग आज तक ज्ञात नहीं कर पाया है। ...और पढ़ें
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Publish Date: Mon, 11 Jun 2018 02:34:22 PM (IST)Updated Date: Mon, 11 Jun 2018 05:07:33 PM (IST)

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ की राजपक्षी का दर्जा मिलने के 16 साल बाद भी बस्तर पहाड़ी मैना का संवर्धन नहीं हो पाया है। अब तो यह पहले की तरह जंगलों में भी नजर नहीं आ रही है। इधर वन विद्यालय के पिंजरे में अध्ययन के लिए पाली गई कई मैना मर चुकी हैं, लेकिन मैना के प्रजनन का अध्ययन करने वालों को भी 26 साल बाद कोई सफलता नहीं मिल पाई है। जंगलों से मैना को पकड़ कर लाना और पिंजरे में पालना ही विभाग का काम रह गया है।
किसी जमाने में एक रुपये शुल्क देकर बस्तर से पहाड़ी मैना की निकासी होती थी, चूंकि उन दिनों यहां मैना की बहुलता थी। लेकिन वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद वनों में पाए जाने वाले किसी भी पक्षी को पकड़ना प्रतिबंध कर दिया गया। बावजूद इसके चोरी छिपे मैना को पकड़ कर बेचना जारी रहा।
इसके चलते बस्तर पहाड़ी मैना कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के कोटमसर, कोलेंग, तीरिया प्रक्षेत्र के अलावा बैलाडीला की पहाड़यों और गंगालूर इलाके में यह सिमट कर रह गई, लेकिन अब यहां भी नजर नहीं आ रही हैं। तेजी से लुप्त हो रही बस्तर पहाड़ी मैना को बचाने का काम वैसे तो बस्तर में वर्ष 1992 से शुरू हो चुका है।
वन विद्यालय में 26 साल पहले 92 हजार रुपये का पिंजरा बनाकर कुछ मैना को रखा गया था। बाद में करीब 14 लाख रुपये खर्च कर इनके लिए बड़ा पिंजरा बनाया गया, लेकिन बीते 26 साल में किसी भी मैना ने यहां प्रजनन नहीं किया। इस बीच पायल, काजल आदि नाम की कई मैना की पिंजरे में मौत भी हो गई है।
वर्ष 2002 में बस्तर पहाड़ी मैना को राजपक्षी का दर्जा दिया गया, लेकिन बीते 16 साल में भी इनका कायदे से संरक्षण और संवर्धन नहीं हो पाया। फिलहाल वन विद्यालय के विशाल पिंजरें में फिर तीन बस्तर पहा़ड़ी मैना को रखा गया है। विडंबना यह है कि पिंजरे में रखी मैना नर है या मादा? यह वन विभाग आज तक ज्ञात नहीं कर पाया है।