नईदुनिया प्रतिनिधि, जशपुरनगर: जशपुर जिले में ईब और उसकी सहायक नदी सोनाजोरी से स्वर्ण कण निकालने का काम स्थानीय जनजातीय समुदाय सदियों से करता आ रहा है। तमाम खोज और सर्वे के बावजूद यह रहस्य नहीं सुलझ पाया है कि नदी के पानी में स्वर्ण कण कहां से आते हैं।
इस काम में दक्षता के कारण झोरा जाति के लोगों को ‘स्वर्ण पुत्र’ कहा जाता है। रियासतकाल में वे राजवंशों की सेनाओं में अहम भूमिका निभाते थे। ईब और सोनाजोरी से स्वर्ण कण निकालने का काम बारिश का मौसम शुरू होते ही कांसाबेल और फरसाबहार में शुरू हो जाता है।
महिला, पुरुष और बच्चे नदी के पानी तथा मिट्टी को छानकर कण जुटाते हैं। इन दिनों फरसाबहार तहसील के भगोरा, बोखी, मेंडरबहार, तुबा, वनगांव, धौरासांड़, हेटघिंचा, खुंटगांव और औरीजोर तथा कांसाबेल तहसील के दोकड़ा, शबदमुंडा, देवरी, गरियादोहर और जोगबहला में यह काम चल रहा है।
नदी में स्वर्ण कणों के स्रोत का पता लगाने के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार ने वर्ष 2010 में दो निजी कंपनियों-जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड और मुंबई की मार्क कंपनी-को सोना, हीरा और अन्य बहुमूल्य खनिजों की खोज के लिए रिकगनिशन परमिट जारी किया था।
करीब छह माह के सर्वे में जिले में स्वर्ण भंडार होने की पुष्टि हुई, लेकिन उसकी मात्रा और स्थान का पता नहीं चला। जिले में उत्खनन उद्योग के विरोध के चलते सर्वे बीच में रोक दिया गया।
लकड़ी के औजार से निकालते हैं कण
स्वर्ण कण जुटाने के लिए स्थानीय लोग लकड़ी के विशेष पात्र का इस्तेमाल करते हैं, जिसे दोबायन कहते हैं। आयताकार इस पात्र का बीच का हिस्सा कटोरे जैसा होता है। इसमें नदी का पानी और मिट्टी लेकर छानने पर स्वर्ण कण बीच में बने छिद्र में जमा हो जाते हैं। फिर निझायर नाम के छोटे लकड़ी के पात्र से निक्षेप को सावधानी से धोया जाता है।
मिट्टी और बालू अलग होने पर स्वर्ण कण चमकने लगते हैं। इस विधि और औजार का श्रेय झोरा जाति को दिया जाता है। स्वतंत्रता से पहले यह समुदाय रियासतों की सेनाओं में काम करता था। रियासतों के विलय के बाद इसने फरसाबहार में ईब नदी के मुहाने पर बस्ती बसाई और स्वर्ण कण छानने का काम शुरू किया।
तस्करों और दलालों के जाल में ग्रामीण
पमशाला निवासी शांति बाई के मुताबिक, तीन दिन की मेहनत के बाद धान के एक दाने के बराबर सोना जुटता है। स्थानीय दलाल इसे 4 से 5 सौ रुपये में खरीदते हैं, जबकि बाजार में इसकी कीमत एक हजार रुपये तक होती है। दलाल ग्रामीणों से खरीदे कण दूसरे प्रदेशों से आने वाले बड़े व्यवसायियों को बेचते हैं।
किवदंतियों में स्वर्ण कणों का रहस्य
स्थानीय मान्यता के अनुसार, रामायणकाल में मारीच स्वर्ण मृग बनकर ईब नदी से गुजरा था। उसके शरीर के संपर्क से नदी में स्वर्ण कण आए। एक अन्य मान्यता तपकरा के पास ईब नदी के मुहाने पर स्थित कोतेबीरा धाम और नागलोक के प्रवेश द्वार को सोने से जोड़ती है। कहा जाता है कि देवगण सोने के बर्तनों से यात्रियों की सेवा करते थे। बर्तन लूटने की कोशिश से नाराज होकर वे नाग रूप धारण कर पाताल लोक चले गए और कुछ बर्तन ईब नदी में छोड़ गए। इनमें से ही स्वर्ण कण निकलने की मान्यता है।