पाली, नईदुनिया न्यूज। कटघोरा वनमंडल के पाली वन परिक्षेत्र अंतर्गत करतली जंगल में साल पेड़ों की अंधाधुंध अवैध कटाई हो रही है। तीन माह से वन विभाग के कर्मचारियों का पेट्रोलिंग बंद है। सुरक्षा की अनदेखी करने के कारण लकड़ी तस्करों के हौसले बुलंद हैं। जंगल के आसपास रहने वाले ग्रामीणों को नकद में खरीदी का लालच देकर तस्कर चोरी के लिए मजबूर कर रहे हैं। रातोंरात कट रहे इमारती पेड़ों की ट्रक व ट्रैक्टर से ढुलाई हो रही है। लगातार हरे पेड़ों की कटाई से हरियाली क्षेत्र सिमटने लगा है।

एक ओर देश भर में पौधे लगाओ हरियाली बचाओ के नारे लग रहे हैं, वही पाली वनपरिक्षेत्र में पेंड़ों की कटाई से हरियाली का विनाश हो रहा है। मानगुरु पहाड़ी श्रृंखला से जुड़े पाली वन परिक्षेत्र में लकड़ी तस्कर सक्रिय हो गए हैं। करतली जंगल में साल, सरई, चार आदि के वयस्क पेड़ों की कटाई हो रही है। सघन जंगल में पेड़ों की कटाई के लिए चिन्हांकन दिन रहते ही कर लिया जाता है। रात में कटाई कर पत्तों से ढंक कर सूखने के लिए एक दो दिन छोड़ दिया जाता है।

कटी लकड़ियों की संख्या जब 10 से 20 हो जाती है तब उसे ट्रक अथवा ट्रैक्टर में भर कर आसपास गांव में डंप कर दिया जाता है। विवाह का सीजन नजदीक होने के कारण दीवान, सोपᆬा आदि के लिए लकड़ियों की पᆬर्नीचर दुकानों में खासी मांग है। साल और सरई पेड़ों की उम्दा कीमत होने के कारण पेड़ों की कटाई हो रही है। जंगल की सुरक्षा के लिए पहले वनकर्मी पेट्रोलिंग करते थे। पिछले तीन माह से पेट्रोलिंग बंद होने के कारण जंगल की सुरक्षा भगवान भरोसे है। वन परिक्षेत्राधिकारी से लेकर अधिकांश वनकर्मी अपने नियुक्ति स्थल की बजाय अपने गृहग्राम से ड्यूटी करते हैं। अधिकांश कर्मचारी अपने कार्यालयीन समय में अपने कार्यक्षेत्र से नदारत रहते हैं।

वन्य प्राणी असुरक्षित

जंगल की हरियाली दिन-ब-दिन घटती जा रही है। इस वजह से इन हरे-भरे जंगलों में जंगली जानवर भालू, सूअर, चीतल, खरगोश, सियार जैसे जानवरों का आशियाना उजड़ने लगा है। इस घने जंगल में साल के पेड़ अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। पेड़ों की तादाद घटने से कई वन्य जीव-जंतुओं की प्रजाति जंगल से विलुप्त होने की कगार पर आ गई है। असुरक्षित वन्य प्राणियों के शिकार को प्रश्रय मिल रहा है।

बढ़ रहा बेजा कब्जा

पेड़ों की कटाई के साथ जंगल की जमीन पर अवैध बेजा कब्जा हो रहा है। नर्सरी के लगाए गऐ पौधे बढ़ने से पहले ही काट लिए जा रहे हैं। वन समितियों से जुड़े लोगों को अब वनोपज के लिए मोहताज होना पड़ रहा है। पहले जिस तादाद में जंगल से लाख, तेंदू, चार, महुआ आदि का उत्पादन होता था, वह अब घट गया है। अवैध कब्जा पर विभाग की ओर से कार्रवाई नहीं किए जाने से वन रकबा सिमट रहा है।

Posted By: Nai Dunia News Network