ओरी चिरैया नन्ही सी चिड़िया...अंगना में फिर आजा रे
आंगन में चहकती फुदकती गौरैया को देखना किसे अच्छा नहीं लगता। चीं-चीं- चुक की आवाज निकालती नन्हीं चिड़िया एक आत्मीय सुख का अनुभूति कराती है। यह बात किसी ...और पढ़ें
By Yogeshwar SharmaEdited By: Yogeshwar Sharma
Publish Date: Sat, 08 Oct 2022 11:17:51 AM (IST)Updated Date: Sat, 08 Oct 2022 11:26:07 AM (IST)

कोरबा । आंगन में चहकती फुदकती गौरैया को देखना किसे अच्छा नहीं लगता। चीं-चीं- चुक की आवाज निकालती नन्हीं चिड़िया एक आत्मीय सुख का अनुभूति कराती है। यह बात किसी के घर के मुंडेर या आंगन के लिए भले ही कहानी हो लेकिन गोढ़ी निवासी दुर्गा के लिए हकीकत है। जिसके आंगन में सुबह से शाम ढलने के पहले तक 100 से अधिक संख्या में गौरेया चहकती रहती हैं।
शहर के निकट ग्राम गोढ़ी में अन्य घरों की तरह 15 वर्षीय दुर्गा सारथी का भी घर है, लेकिन चिड़ियों की जितनी कलरव उसके आंगन में है वह अन्य के घर में नहीं है। घर से आंगन में दुर्गा के आते ही चिड़ियों चहचहाहट और भी अधिक बढ़ जाती है। गौरेया से दोस्ती के बारे में दुर्गा कहती है कि उसे नन्हे परिंदों से बचपन से ही लगाव है। गांव की स्कूल में दसवी कक्षा की छात्रा दुर्गा ने बताया कि साल भर पहले उसके आंगन में इक्के दक्के चिड़िया ही दिखाई देते थे। एक दिन स्कूल जाने से पहले जब सुबह खाना खाने बैठी थी तब थाली से भात को उनकी ओर फेंका तो चिड़िया उन्हे चाव से खाने लगी। यह सिलसिला लगातार जारी रही है। फिर उसने चावल के अलावा चिड़ियों के लिए सुबह व दोपहर डालना भी शुरू किया। यह क्रम अब उसके आदत में शामिल है। आंगन में चिड़ियों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। दुर्गा कहती हैं कि उसके घर या बाड़ी में चिड़ियों अभी तक एक भी घोंसला तैयार नहीं किया है। ये नन्हे परिंदे कहां से आते हैं और कहां चले जाते हैंं उसे इसके बारे में पता नहीं है।
भूख लगते ही सीट के छत को मारती हैं चोंच
दुर्गा के आंगन में गौरैयों को इतनी संख्या में फुदकना लोगों के लिए कौतूहल बना हुआ है। दुर्गा कहती कहती कि किसी दिन जब किसी कार्यवश दाना डालने में देरी हो जाती है, तब गौरैया घर सीट के छत को चोंच मारकर उसे भूखे होने का एहसास दिलाती हैं। घर से बाहर दूसरे गांव चले जाने पर दुर्गा की जगह उसकी मां चिड़ियों को दाना देती है।
हानिकारक तरंगों का दुष्प्रभाव
दुर्गा का कहना है कि उसने ऐसा सुना है कि हानिकारक किरणों और मोबाइल व अन्य तकनीक संसाधनों के अदृश्य तरंगों से परिंदों की संख्या कम होती जा रही हैं। उसका संरक्षण करना हम सभी का कर्तव्य है, तभी उनका संवर्धन होगा। पशु पक्षी ऐसे जीव हैं जो आदि काल से मनुष्य के साथी रहे हैं। ये सभी प्रेम की भाषा समझते हैं।