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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 06, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

छत्तीसगढ़ में मानव तस्करी के आंकड़े डराने वाले, आदिवासी और पिछड़े क्षेत्र के लोगों का बनाया जा रहा निशाना

छत्तीसगढ़ में मानव तस्करी एक गंभीर समस्या बन गया है। पिछले 2 सालों में राज्य मानव तस्तकी के 39 मामले सामने आए हैं, जिनमें 83 लोगों की गिरफ्तारी हुई है...और पढ़ें

By Satish PandeyEdited By: Roman Tiwari
Publish Date: Wed, 06 Aug 2025 03:43:27 PM (IST)Updated Date: Wed, 06 Aug 2025 03:51:09 PM (IST)
छत्तीसगढ़ में मानव तस्करी के आंकड़े डराने वाले, आदिवासी और पिछड़े क्षेत्र के लोगों का बनाया जा रहा निशाना
छत्तीसगढ़ में बढ़ रहे मानव तस्करी के मामले

सतीश पांडेय, नईदुनिया, रायपुर: दुर्ग जिले में दो नन सहित तीन लोगों की हालिया गिरफ्तारी ने मानव तस्करी जैसी गंभीर समस्या की ओर राज्यभर का ध्यान खींचा है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि मानव तस्करी, विशेषकर आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों में, सालों से राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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बेरोजगारी और बेहतर अवसरों की तलाश में होने वाला प्रवासन इस समस्या को और भी जटिल बना रहा है, जिससे तस्करों को अपना जाल फैलाने का मौका मिल रहा है। वे आदिवासी और पिछड़े क्षेत्र के लोगों को टारगेट कर रहे हैं। राज्य में वर्ष 2023 से फरवरी 2025 तक मानव तस्करी के करीब 39 प्रकरण दर्ज हुए हैं। इनमें से कुल पीड़ितों की संख्या 66 है, जबकि मामले में 83 लोगों की गिरफ्तारी की जा चुकी है।


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मानव तस्करी से जुड़े जानकारों का कहना है कि सरगुजा, जशपुर, कोरबा, बलरामपुर और बस्तर जैसे सीमावर्ती जिलों में तस्करी की घटनाएं अधिक होती हैं। इन क्षेत्रों में बेरोजगारी और प्रवासन की प्रवृत्ति अधिक होने के कारण तस्कर आसानी से झांसे में लेने में सफल हो जाते हैं। इनमें से अधिकांश पीड़ित नाबालिग लड़कियां और महिलाएं हैं, जिन्हें बहला-फुसलाकर दूसरे राज्यों में घरेलू काम, जबरन श्रम या यौन शोषण के लिए भेजा गया है।

63 हजार से अधिक लोगों ने किया प्रदेश से प्रवासन

कामकाज की तलाश में राज्य से बड़ी संख्या में लोग पलायन करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2024 से फरवरी 2025 तक राज्य से 63 हजार से अधिक लोगों ने प्रवासन किया है। इनमें सबसे अधिक संख्या बलौदाबाजार जिले की है। यहां से करीब 13 हजार 200 लोग कामकाज की तलाश में अपना गांव छोड़कर अन्य राज्यों में गए हैं।

ज्यादातर प्रवासन जशपुर, बिलासपुर, मुंगेली, कोरबा, जांजगीर-चांपा, सक्ती, रायपुर, महासमुंद, राजनांदगांव, कबीरधाम, खैरागढ़-गंडई-छुईखदान जैसे जिलों से होता है। पुलिस और एंटी ह्यूमन ट्रैकिंग यूनिट की सक्रियता से कई मामलों में पीड़ितों की घर वापसी हुई है। कई आरोपितों की गिरफ्तारी भी हुई है, लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि मानव तस्करी का नेटवर्क अब भी जमीनी स्तर पर काफी मजबूत है और एजेंट आज भी गांवों में सक्रिय होकर यह काम कर रहे है।

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अपराध की गंभीरता और पीड़ितों की संख्या के आधार पर सजा

मानव तस्करी के मामले में, सजा अपराध की गंभीरता और पीड़ितों की संख्या के आधार पर भिन्न होती है। भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में मानव तस्करी के लिए कठोर दंड का प्राविधान है, जिसमें कम से कम सात वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष कारावास से कम सजा नहीं होगी, लेकिन आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। साथ ही जुर्माना शामिल हैं।