
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, रायपुर। नगरीय निकायों की लापरवाही 16वें वित्त आयोग से मिलने वाले अनुदान की पात्रता पर भारी पड़ सकती है। सिटी फाइनेंस पोर्टल पर जरूरी जानकारी दर्ज करने के लिए चार बार पत्र जारी किए गए, केंद्र और राज्य स्तर पर प्रशिक्षण भी दिया गया, लेकिन इसके बावजूद प्रगति संतोषजनक नहीं है।
अब नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने निगम आयुक्तों और नगर पालिका परिषदों व नगर पंचायतों के मुख्य नगर पालिका अधिकारियों को 10 दिनों में अधूरी जानकारी पूरी करने का समय दिया है। देरी का खामियाजा अनुदान की पात्रता पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, निकायों को पोर्टल पर दो वित्तीय वर्षों का हिसाब देना होगा। इसमें वर्ष 2024-25 का अंकेक्षित लेखा-जोखा और 2025-26 का प्रारंभिक हिसाब अपलोड किया जाना है। इसके तहत कुल प्राप्ति, व्यय, आय और बैंक में उपलब्ध नकदी आदि का विवरण देना शामिल है। इसके साथ ही, वर्ष 2024-25 की लेखा जांच रिपोर्ट और हिसाब-किताब से जुड़ी टिप्पणियां भी दर्ज करनी होंगी।
वित्तीय विवरण के साथ 28 सेवा स्तरीय मानकों के प्रपत्र भरना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, बंधे हुए कार्यों और अन्य कार्यों पर खर्च की जा सकने वाली राशि से संबंधित प्रपत्र भी भरने होंगे। अधिकारियों के अनुसार, केंद्र सरकार का सिटी फाइनेंस पोर्टल ही अब अनुदान मिलने की पात्रता का एकमात्र पैमाना है। यदि पोर्टल खाली रहा, तो राशि नहीं मिलेगी।
विभाग ने निकायों को समय पर जानकारी भरने के लिए चार बार पत्र जारी किया था। केंद्र और राज्य स्तर पर इसके लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए गए थे। इसके बावजूद कई निकायों ने पोर्टल पर जरूरी जानकारी अपलोड नहीं की है। इसी लापरवाही को देखते हुए अब विभाग ने सख्त रुख अपनाते हुए 10 दिन के भीतर पूरी जानकारी अपलोड करने का निर्देश दिया है। विभाग का कहना है कि यह जानकारी सीधे केंद्र सरकार को भेजी जाती है और इसी के आधार पर अनुदान तय होता है।
सेवा स्तरीय मानकों के प्रपत्र में निकायों को पेयजल कनेक्शन, जलापूर्ति की मात्रा और गुणवत्ता, सीवरेज, नालियों, ठोस कचरे के संग्रहण और प्रसंस्करण सहित शहरी सेवाओं की जानकारी देनी है। निकायों को पानी की आपूर्ति का हिसाब अनुमान से नहीं, नाप-जोख के आधार पर देना है। विभाग की ओर से वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए जलप्रदाय के आंकड़े जुटाने और उनकी जांच की गाइडलाइन जारी की गई है।
गाइडलाइन के अनुसार, ट्रीटमेंट प्लांट, ओवरहेड टैंक, पावर पंप, बोरवेल और हैंडपंप से होने वाली जलापूर्ति का हिसाब लिया जाएगा। इसके लिए टैंकर या बाल्टी भरने में लगने वाले समय से पानी की मात्रा निकाली जाएगी। जिन वार्डों में सिंटेक्स टंकियों या हैंडपंप से पानी मिलता है, वहां परिवारों से सर्वे कर पूछा जाएगा कि रोज कितनी बार और कितनी क्षमता की बाल्टी भरी जाती है।
घरेलू जल कनेक्शनों में से तीन से पांच प्रतिशत का हर दो महीने में सर्वे होगा। उपभोक्ता के सामने 16 या 20 लीटर की बाल्टी भरकर वास्तविक जलप्रवाह मापा जाएगा। इसी आधार पर खपत का अनुमान तैयार होगा। अपार्टमेंट और व्यावसायिक कनेक्शनों की भी जांच की जाएगी।
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निकायों को पानी की गुणवत्ता जांच, क्लोरीन परीक्षण और जलप्रदाय पर हुए खर्च का ब्योरा भी देना होगा। इसके साथ सड़कों, ढंकी नालियों, सीवेज शोधन संयंत्रों और सेप्टेज मशीनों की जानकारी भी परफार्मेंस असेसमेंट सिस्टम पोर्टल पर दर्ज करनी है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता लाने और शहरी सेवाओं की सही स्थिति जानने के लिए जरूरी है।