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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 07, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

चार साल की लंबी कानूनी लड़ाई, एक एमबीबीएस डॉक्टर ने कैसे 'वकील' बनकर खुद लड़ा अपना केस, जानिए पूरी कहानी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी के साथ बेमेतरा के डॉक्टर के तलाक केस में दी थी मंजूरी। पीड़ित युवक ने कहा- निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक मैंने खु...और पढ़ें

By Ramkrishna DongreEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Fri, 07 Feb 2025 08:47:57 AM (IST)Updated Date: Fri, 07 Feb 2025 12:18:34 PM (IST)
चार साल की लंबी कानूनी लड़ाई, एक एमबीबीएस डॉक्टर ने कैसे 'वकील' बनकर खुद लड़ा अपना केस, जानिए पूरी कहानी
डॉ. प्रशांत झा और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की तस्वीर।

HighLights

  1. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने डॉक्टर को तलाक की मंजूरी दी।
  2. अदालत ने पत्नी के व्यवहार को क्रूरता करार दिया।
  3. शादी के ढाई महीने बाद ही घर छोड़ गई थी पत्नी।

रामकृष्ण डोंगरे, नईदुनिया, रायपुर। एक एमबीबीएस डॉक्टर, एक पत्नी प्रताड़ित पति, जिन्हें चार साल की कानूनी लड़ाई के बाद बिलासपुर हाईकोर्ट से तलाक मिला है। यह कहानी बेमेतरा जिले के डॉक्टर प्रशांत झा की है, जो राजधानी रायपुर के निजी अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

उन्होंने कहा- 'निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक अपना केस मैंने खुद लड़ा है। जब कोई पुरुष झूठे और फर्जी केस में फंसा हो तो बिल्कुल ना डरें, आत्महत्या ना करें। साहस के साथ अपनी लड़ाई स्वयं लड़ें।'

बेमेतरा जिले के बेरला तहसील के ग्राम पिरदा निवासी प्रशांत ने बताया कि उनका विवाह 10 जून, 2017 को खैरागढ़-छुईखदान-गंडई की युवती से हुआ था। वह सिर्फ ढाई महीने तक गांव में रहीं। इसके बाद कोचिंग के लिए बिलासपुर जाने और अलग रहने की जिद करने लगी और एक दिन बिना बताए घर छोड़कर चली गईं।


पिता ने बेटे का दांपत्य जीवन बचाने का प्रयास किया

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प्रशांत के पिता व शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला कंडरका के प्रभारी प्राचार्य राजेंद्र झा ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे का दांपत्य जीवन बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया। सामाजिक स्तर पर भी कोशिश की गई।

रायपुर में अलग घर में रहने की इजाजत दी, लेकिन वहां भी वे मात्र कुछ सप्ताह ही साथ रह पाए। इस दौरान हमें सब कुछ सहन करना पड़ा। प्रशांत ने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि 80 से 85 प्रतिशत महिलाएं झूठे केस लगाती हैं।

इसका उद्देश्य पति को प्रताड़ित करना और मोटी रकम वसूलना होता है। झूठे केस में फंसे युवाओं से कहना चाहता‌ हू कि कानून का अध्ययन करें और अपना‌ केस खुद‌ लड़े‌। हमारे देश का कानून बहुत सुंदर है।

डॉक्टर प्रशांत झा ने सुनाई आपबीती

मैं कई पुराने व ऐतिहासिक फैसलों और कानून का लगातार अध्ययन करता था। बिना अधिवक्ता के मैंने खुद अपनी याचिका तैयार की। निचली अदालत में तलाक की याचिका खारिज होने के बाद मैंने 31 जनवरी, 2024 में हाईकोर्ट में केस लगाया और ठीक एक साल बाद फैसला आ गया।

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वैसे तो तलाक के केस चार-पांच साल चलते हैं। मैं एक बात बताना चाहता हूं कि वैवाहिक मामलों के लिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 21- बी की उपधारा 2 और 3 में यह परिभाषित किया गया है कि तलाक के केस को परिवार न्यायालय में छह माह और हाईकोर्ट में 90 दिनों में निपटारा करने का प्रविधान है।

जागरूकता के अभाव के चलते पुरुषों को दस-बारह साल तक परेशान होना पड़ता है। इस आशय के मेरे आवेदन पर हाई कोर्ट ने संज्ञान लेकर शीघ्र फैसला किया। इसलिए मैं न्याय प्रणाली और हाईकोर्ट को धन्यवाद देता हूं।

माता-पिता को लगा था गहरा सदमा : प्रशांत

देश के हर माता-पिता इसी आशा के साथ बेटे का विवाह करते हैं कि बहू आएगी, घर-परिवार संभालेगी, वंशवृद्धि होगी और सब बढ़िया से चलेगा, लेकिन जब शादी के ढाई माह बाद बहू अलग रहने की जिद करें, घर छोड़कर चली जाए तो उन पर क्या बीतती है? मेरे माता-पिता को भी गहरा सदमा लगा था।

परेशान और दुखी रहने लगे थे। मुझे देखकर और परेशान हो जाते थे। लड़का इतनी मेहनत कर रहा है, कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहा है। पता नहीं कब न्याय मिलेगा। मिलेगा भी या नहीं। दूसरा पक्ष यह था कि घर की बड़ी बहू के जाने के बाद घर को संभालने वाला कोई नहीं था।

आखिर क्या था मामला

बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस तलाक के मामले को मंजूर करते हुए कहा कि पत्नी का पति को माता-पिता से अलग रहने के लिए कहना क्रूरता है। पत्नी शादी के बाद कुछ ही महीनों में ससुराल छोड़कर चली गई थी और वापस आने को तैयार नहीं थी।