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CG News: विवादों में 125 साल पुराने गोलबाजार का मालिकाना हक, भंवर में 960 दुकानदारों का भविष्य

CG News: 125 साल पुराने गोलबाजार में किराएदारों को मालिकाना हक देने की योजना अब विवादों और प्रशासनिक उलझनों में फंसकर लगभग ठप हो गई है। चार साल बीतने ...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Manoj Dubey
Publish Date: Sun, 30 Nov 2025 03:22:38 PM (IST)Updated Date: Sun, 30 Nov 2025 03:23:47 PM (IST)
CG News: विवादों में 125 साल पुराने गोलबाजार का मालिकाना हक, भंवर में 960 दुकानदारों का भविष्य
125 साल पुराने गोलबाजार में खरीदारी करने दूर-दूर से आते हैं लोग।

HighLights

  1. चार साल बीतने के बावजूद केवल 15 रजिस्ट्री
  2. गाइडलाइन दरें बनीं रुकावट
  3. विकास शुल्क और दस्तावेजी प्रक्रिया से बढ़ी परेशानी

नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर : 125 साल पुराने गोलबाजार में किराएदारों को मालिकाना हक देने की योजना अब विवादों और प्रशासनिक उलझनों में फंसकर लगभग ठप हो गई है। वर्ष 2020 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट में 960 दुकानदारों को स्थायी समाधान देने का लक्ष्य था। लेकिन गाइडलाइन दरों में अंतर, विकास शुल्क की ऊंची मांग, दुकानों की चौहद्दी निर्धारण में लगातार आ रही आपत्तियां और दस्तावेजी प्रक्रिया की धीमी रफ्तार ने इसे पटरी से उतार दिया।

चार साल बीतने के बावजूद केवल 15 रजिस्ट्री

चार साल बीतने के बावजूद केवल 15 रजिस्ट्री होना इस योजना की विफलता का सबसे बड़ा संकेत है। बाजार के भीतर स्थित करीब 480 दुकानों की दरें मेन रोड के बराबर रखने पर व्यापारियों ने विरोध जताया, जिसके चलते प्रक्रिया रुक गई।


अब महापौर मीनल चौबे ने संकेत दिया है कि गोलबाजार की वास्तविक स्थिति, आपत्तियों और बाजार की जरूरतों को देखते हुए योजना को नए सिरे से पुनरीक्षित किया जाएगा, ताकि व्यवहारिक समाधान निकाला जा सके।

गाइडलाइन दरें बनीं रुकावट

मालिकाना हक योजना में सबसे महत्वपूर्ण विवाद गाइडलाइन दरों को लेकर सामने आया। मुख्य सड़क से लगी दुकानों की गाइडलाइन दर 1.50 लाख रुपये प्रति वर्गमीटर रखी गई, जबकि बाजार के भीतर स्थित दुकानों की दर 90 हजार प्रति वर्गमीटर तय की गई।

व्यापारियों का कहना है कि ग्राहकी, पहुंच, पार्किंग और व्यावसायिक उपयोगिता में बड़ा अंतर होने के बावजूद दरें लगभग समान असर पैदा करती हैं, जो अव्यावहारिक है। जिन 480 दुकानों पर यह दर लागू हुई, उनमें से अधिकांश दुकानदारों ने आपत्ति दर्ज कराई।

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विकास शुल्क और दस्तावेजी प्रक्रिया से बढ़ी परेशानी

योजना में दुकानदारों को विकास शुल्क भी देना था, जो कई मामलों में लाखों रुपये तक पहुंच गया। व्यापारियों ने इसे अनुचित बताते हुए रियायत की मांग की, जबकि नगर निगम और राजस्व विभाग के बीच शुल्क निर्धारण को लेकर तालमेल न होने से प्रक्रिया अटक गई। इसके अलावा दुकानों की चौहद्दी नापजोख, पुराने दस्तावेजों की पुष्टि, संपत्ति कर रिकार्ड का मिलान और वास्तविक कब्जे की जांच जैसी प्रक्रियाओं ने दुकानदारों को महीनों तक चक्कर कटवाए। कई दुकानदारों ने इसे बिना तैयारी शुरू किया गया प्रोजेक्ट बताकर विरोध दर्ज कराया था।