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छत्तीसगढ़ में मतांतरण विरोधी विधेयक पारित कराने से पहले ही कानूनी पेंच में फंसी साय सरकार, बजट सत्र में पेश होने की उम्मीद कम

साय सरकार के कड़े मतांतरण विरोधी कानून लाने बड़ी अड़चन नजर आ रही है। शीतकालीन सत्र में विधेयक लाने की घोषणा के बाद अब बजट सत्र में भी इसके पेश होने की...और पढ़ें

By Sandeep TiwariEdited By: Roman Tiwari
Publish Date: Mon, 02 Feb 2026 08:21:49 AM (IST)Updated Date: Mon, 02 Feb 2026 08:34:54 AM (IST)
छत्तीसगढ़ में मतांतरण विरोधी विधेयक पारित कराने से पहले ही कानूनी पेंच में फंसी साय सरकार, बजट सत्र में पेश होने की उम्मीद कम

HighLights

  1. 23 फरवरी से शुरू होने जा रहा बजट सत्र
  2. बजट सत्र में विधेयक पेश होने की उम्मीद कम
  3. मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में लंबित है

राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, रायपुर: विष्णु देव साय सरकार के कड़े मतांतरण विरोधी कानून लाने के संकल्प पर फिलहाल कानूनी अड़चनों के बादल मंडरा रहे हैं। शीतकालीन सत्र में विधेयक लाने की घोषणा के बाद अब 23 फरवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र में भी इसके पेश होने की उम्मीद कम नजर आ रही है। मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जिसने विधेयक की राह कठिन कर दी है।

दरअसल, देश के विभिन्न राज्यों में लागू मतांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सहित उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड और राजस्थान को नोटिस जारी करके जवाब दाखिल करने कहा है।


अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी तक टाल दी है। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार चूंकि मूल कानून की वैधता पर ही सवालिया निशान है, इसलिए राज्य सरकार नए संशोधन विधेयक को लेकर फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।

प्रस्तावित कानून: 10 साल की सजा का प्रविधान

सूत्रों के अनुसार साय सरकार जिस नए विधेयक पर काम कर रही है, वह ''छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 1968'' का स्थान लेगा। इसमें सजा के कड़े प्रावधान शामिल हैं। प्रलोभन या जबरन मतांतरण पर 10 साल तक की कैद, मतांतरण से 60 दिन पहले जिला प्रशासन को सूचना देना अनिवार्य होना, वर्तमान में मात्र 5,000 रुपये जुर्माने का प्रविधान है, जिसे कई गुना बढ़ाने की तैयारी है। राज्य सरकार का कहाना है कि जबरन मतांतरण और प्रलोभन की परिभाषा को और अधिक व्यापक बनाया जा रहा है।

बस्तर और सरगुजा में बढ़े मामले

एक अनुमान के मुताबिक राज्य में पिछले दो वर्षों में मतांतरण से जुड़ी 100 से अधिक शिकायतें दर्ज की गई हैं। हिंदू संगठनों का आरोप है कि विशेषकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों (बस्तर और सरगुजा) में भोले-भाले ग्रामीणों को निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि, उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा का कहना है कि मंत्रिमंडलीय उप-समिति इस पर काम कर रही है, लेकिन उन्होंने विधेयक पेश करने की निश्चित तिथि पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

यह भी पढ़ें- गरियाबंद में शिवलिंग खंडित करने वाले आरोपियों ने जेल से निकलते ही किया विवाद, दो समुदायों के बीच हिंसक झड़प, घरों में लगाई आग

हालिया घटनाएं: राज्य में तनाव की स्थिति

  • केस 01: राजनांदगांव में प्रार्थना सभा पर हंगामा एक फरवरी 2026 को राजनांदगांव के मोतीपुर में एक घर के भीतर चल रही ईसाई प्रार्थना सभा को लेकर हिंदूवादी संगठनों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। आरोप था कि वहां मतांतरण कराया जा रहा है। पुलिस के दखल के बाद मामला शांत हुआ।

  • केस 02: सेवानिवृत्त डिप्टी कलेक्टर गिरफ्तार 29 जनवरी 2026 को सरगुजा पुलिस ने चंगाई सभा की आड़ में मतांतरण कराने के आरोप में रिटायर्ड डिप्टी कलेक्टर ओमेगा टोप्पो को गिरफ्तार किया। उनके निवास पर 50-60 लोग मौजूद थे, जहां कथित तौर पर मतांतरण की प्रक्रिया चल रही थी।

  • केस 03: कांकेर में प्रलोभन का आरोप पांच जनवरी 2026 को कांकेर में एक प्रार्थना सभा को लेकर ग्रामीणों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया। ग्रामीणों का दावा था कि आर्थिक प्रलोभन देकर लोगों का मतांतरण कराया जा रहा है, जिससे इलाके में तनाव व्याप्त हो गया था।