रिश्वत के नोट जेब से मिले, फिर भी छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से बरी हुआ अकाउंटेंट, सूरजपुर के विशेष कोर्ट का फैसला निरस्त
रिश्वत की रकम बरामद होना भ्रष्टाचार का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को पहले यह साबित करना होगा कि आरोपित ने रिश्वत की मांग क...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 22 Sep 2026 08:07:42 PM (IST)Updated Date: Tue, 22 Sep 2026 08:16:46 PM (IST)
HighLights
- स्कूल की मान्यता के एवज में कथित रिश्वत मांग
- आठ हजार लेते रंगे हाथों पकड़ा गया था
- ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता ने बदल दी कहानी
नईदुनिया न्यूज, सूरजपुर। रिश्वत की रकम बरामद होना भ्रष्टाचार का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को पहले यह साबित करना होगा कि आरोपित ने रिश्वत की मांग की थी। इसी महत्वपूर्ण कानूनी पहलू को रेखांकित करते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सूरजपुर की विशेष अदालत के मार्च 2017 के फैसले को निरस्त कर दिया है।
साथ ही हाई कोर्ट ने रिश्वतखोरी के मामले में आरोपित अकाउंटेंट को सभी आरोपों से बरी कर दिया। मामला वर्ष 2014 का है।
स्कूल की मान्यता के एवज में कथित रिश्वत मांग
अभियोजन पक्ष के अनुसार मां सरस्वती शिक्षा समिति द्वारा संचालित एक स्कूल की मान्यता के एवज में तत्कालीन अकाउंटेंट ने समिति के अध्यक्ष से 15 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी। बाद में कथित तौर पर सौदा आठ हजार रुपये में तय हुआ।
शिकायत के आधार पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने 30 जून 2014 को सूरजपुर स्थित जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में ट्रैप कार्रवाई की थी।
आठ हजार लेते रंगे हाथों पकड़ा गया
अभियोजन पक्ष का दावा था कि कार्रवाई के दौरान आरोपित ने आठ हजार रुपये स्वीकार किए थे और उसे रंगे हाथों पकड़ा गया। आरोपित की जेब से रकम बरामद होने के साथ केमिकल जांच में भी नोटों के संपर्क में आने की पुष्टि हुई थी। इन्हीं परिस्थितियों के आधार पर मामले में अभियोजन ने आरोप सिद्ध करने का प्रयास किया।
शिकायतकर्ता ने ही बदल दी कहानी
लेकिन ट्रायल के दौरान मामले की तस्वीर बदल गई। जिस व्यक्ति की शिकायत पर एसीबी ने कार्रवाई की थी, उसी शिकायतकर्ता ने अदालत में बयान दिया कि आरोपित अकाउंटेंट ने उससे रिश्वत की मांग नहीं की थी। वहीं एक अन्य गवाह ने भी अदालत में बताया कि शिकायतकर्ता ने ही पैसे जबरन आरोपित की जेब में डाल दिए थे।
केवल रकम की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि किसी भी गवाह ने रिश्वत की मांग किए जाने के अभियोजन के मुख्य आरोप का समर्थन नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामले में रिश्वत की मांग का प्रमाण महत्वपूर्ण तत्व है और केवल रकम की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
ऑडियो रिकॉर्डिंग पर भी उठे सवाल
मामले में पेश किए गए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी अभियोजन के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुए। हाई कोर्ट ने पाया कि कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग के संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत आवश्यक प्रमाण पत्र नहीं लिया गया था।
इसके अलावा आरोपित की आवाज का नमूना भी नहीं लिया गया था और रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज की पुष्टि के लिए फॉरेंसिक जांच नहीं कराई गई थी। अदालत ने इन कमियों को गंभीरता से लेते हुए अभियोजन के इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया।
रिश्वत की मांग के आरोप को स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित नहीं किए जाने तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों में पाई गई खामियों के आधार पर हाई कोर्ट ने विशेष अदालत का पुराना फैसला रद करते हुए आरोपित अकाउंटेंट को मामले के सभी आरोपों से बरी कर दिया।