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नईदुनिया प्रतिनिधि, सूरजपुर: सूरजपुर जिले के एसईसीएल भटगांव क्षेत्र की प्रस्तावित मदननगर खुली खदान परियोजना को लेकर पुनर्वास की जमीन पर विवाद गहराने लगा है। परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए प्रतापपुर तहसील के ग्राम खैराडीह और बरबसपुर में शासकीय भूमि चिह्नित किए जाने के बाद ग्रामीणों का विरोध सामने आने लगा है। खैराडीह में ग्रामीणों ने जमीन नहीं देने का प्रस्ताव ग्रामसभा में पारित किया है, वहीं बरबसपुर में भी विरोध के स्वर उभर रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि राजस्व अभिलेखों में जमीन शासकीय दर्ज होने के बावजूद इन पर उनके पूर्वजों के समय से कब्जा है और वे लंबे समय से खेती करते आ रहे हैं। इसके अलावा इन जमीनों में चारागाह और श्मशान जैसे उपयोगी स्थल भी शामिल हैं। ऐसे में जमीन पुनर्वास के लिए दिए जाने से उनकी आजीविका और सामाजिक जरूरतें प्रभावित होंगी।
बता दें कि एसईसीएल भटगांव क्षेत्र के क्षेत्रीय महाप्रबंधक (संचालन) ने 20 अगस्त 2026 को सूरजपुर कलेक्टर को पत्र लिखकर मदननगर परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए 95 हेक्टेयर शासकीय भूमि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। पत्र के अनुसार, मदननगर ओपन कास्ट परियोजना के लिए प्रतापपुर तहसील के जगन्नाथपुर, मदननगर और कनकनगर सहित बलरामपुर जिले के राजपुर तहसील अंतर्गत ग्राम चउरा की भूमि का अधिग्रहण किया गया है। पत्र में बताया गया कि प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास योजना तैयार करने के उद्देश्य से शासकीय भूमि की आवश्यकता है।
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दो गांवों में 79 हेक्टेयर जमीन चिन्हित
एसईसीएल ने प्रतापपुर तहसील के राजस्व मंडल टुकूडांड़ अंतर्गत ग्राम खैराडीह में 37.30 हेक्टेयर और बरबसपुर में 41.70 हेक्टेयर शासकीय भूमि ऑनलाइन भू-नक्शे के माध्यम से चिन्हित की है। दोनों गांवों की कुल भूमि 79 हेक्टेयर होती है, जबकि एसईसीएल ने 95 हेक्टेयर जमीन की मांग की है। इस हिसाब से चिन्हित भूमि के अतिरिक्त 16 हेक्टेयर जमीन की जरूरत अभी बाकी है।
एसईसीएल ने कलेक्टर से इन जमीनों की जांच कराने और नियमानुसार उपलब्ध कराने के लिए सक्षम अधिकारी को निर्देशित करने का अनुरोध किया था। इसके बाद तहसीलदार कार्यालय प्रतापपुर ने एक अक्टूबर 2026 को खैराडीह और बरबसपुर के पटवारियों को पत्र जारी कर तीन दिन के भीतर अद्यतन सत्यापित खसरा प्रतियां, स्पष्ट नजरी नक्शा और भूमि की वर्तमान प्रकृति व कब्जे से संबंधित प्रतिवेदन मांगा था। इससे स्पष्ट है कि चिह्नित जमीनों की राजस्व स्थिति और मौके की वास्तविक स्थिति की पड़ताल की जा रही है।
ग्रामीणों का सवाल, दो गांवों पर ही क्यों निर्भरता?
खैराडीह और बरबसपुर के ग्रामीणों का सवाल है कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए केवल इन्हीं दो गांवों की शासकीय जमीनों का चयन क्यों किया जा रहा है? उनका सुझाव है कि आसपास के अन्य गांवों की उपलब्ध शासकीय भूमि में से भी थोड़ी-थोड़ी जमीन लेकर पुनर्वास की व्यवस्था की जाए, ताकि किसी एक या दो गांव पर इसका अधिक बोझ न पड़े।
ग्रामीणों के मुताबिक, शासकीय दर्ज जमीन पर लंबे समय से खेती करने वाले परिवारों के सामने भूमि छिनने से आजीविका का संकट खड़ा हो सकता है। चारागाह और श्मशान जैसी भूमि प्रभावित होने से सामुदायिक जरूरतें भी प्रभावित होंगी।
पुनर्वास की प्रक्रिया में बढ़ सकती है चुनौती
एक तरफ जहां मदननगर परियोजना को लेकर चल रहे गतिरोध का हल अब तक नहीं हो सका है। प्रभावित ग्रामीण नौकरी और मुआवजे के बजाय अधिग्रहित जमीन के बराबर दूसरी जमीन उपलब्ध कराने मांग कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर पुनर्वास के लिए चिन्हित जमीनों के स्थानीय विरोध से प्रशासन और एसईसीएल के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी हो सकती है।
फिलहाल जमीन की जांच और राजस्व दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया सामने आई है। आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ग्रामीणों की आपत्तियों, भूमि के मौजूदा उपयोग और पुनर्वास की जरूरतों को ध्यान में रखकर प्रशासन क्या निर्णय लेता है।