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बाघों की सुरक्षा के लिए जंगल में उतरा सूरजपुर वनमंडल का वन अमला, फंदों से लेकर पगमार्क तक पहचाने का तरीका सिखाया

सूरजपुर वनमंडल में बाघों की सुरक्षा और निगरानी को मजबूत करने के लिए दो दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें वन अमले को पगमार्क पहचानने...और पढ़ें

By Anang Pal DixitEdited By: Manoj Kumar Tiwari
Publish Date: Mon, 14 Sep 2026 06:04:35 PM (IST)Updated Date: Mon, 14 Sep 2026 06:04:35 PM (IST)
बाघों की सुरक्षा के लिए जंगल में उतरा सूरजपुर वनमंडल का वन अमला, फंदों से लेकर पगमार्क तक पहचाने का तरीका सिखाया
मैदानी प्रशिक्षण में शामिल वन अधिकारी-कर्मचारी

HighLights

  1. सूरजपुर वनमंडल में बाघ संरक्षण और निगरानी को लेकर दो दिवसीय कार्यशाला संपन्न।
  2. दो दिवसीय प्रशिक्षण में कैमरे लगाने, गश्त और विज्ञानी साक्ष्य जुटाने का दिया प्रशिक्षण।
  3. ग्रामीणों और स्कूली बच्चों को ‘बाघ चौपाल’ के जरिए संरक्षण अभियान से जोड़ने पर जोर।

नईदुनिया प्रतिनिधि, सूरजपुर: बाघों की मौजूदगी वाले जंगलों में अब उनकी हर गतिविधि पर पैनी नजर रखने के साथ वन अमला अवैध शिकार और वन्यजीवों के लिए बिछाए जाने वाले फंदों की भी तलाश करेगा। बाघ संरक्षण और निगरानी को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सूरजपुर वनमंडल में दो दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें वन अधिकारियों और मैदानी कर्मचारियों को बाघ के पगमार्क से लेकर उसके विचरण मार्ग, मवेशियों के शिकार, अवैध फंदों और अन्य खतरों की पहचान करने के साथ वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य जुटाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।

छत्तीसगढ़ शासन, वन विभाग के निर्देश तथा मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) एवं क्षेत्रीय निदेशक, गुरु घासीदास-तमोर पिंगला बाघ अभयारण्य, सरगुजा के मार्गदर्शन में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला का उद्देश्य बाघ संरक्षण, मैदानी निगरानी, वैज्ञानिक साक्ष्य संकलन तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति में त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई के लिए वन अमले की तकनीकी और व्यावहारिक दक्षता बढ़ाना रहा।


पहले दिन सूरजपुर वनमंडल कार्यालय के सभागार में कक्षा आधारित प्रशिक्षण हुआ। प्रशिक्षण में सरगुजा वन वृत्त में बाघों की वर्तमान एवं ऐतिहासिक मौजूदगी, उनके विचरण मार्ग, केंद्रीय वन परिदृश्य गलियारे और वन क्षेत्रों की आपसी जुड़ाव व्यवस्था के संबंध में जानकारी दी गई। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की बाघ मानचित्रण व्यवस्था के बारे में भी विस्तार से समझाया गया। प्र

शिक्षण में बाघों की मृत्यु के संभावित कारणों पर भी विज्ञानी ढंग से चर्चा हुई। बीमारी, आपसी संघर्ष, प्राकृतिक वृद्धावस्था के साथ शिकार और बिजली का करंट जैसे मानवजनित कारणों की पहचान और उनकी रोकथाम के उपाय बताए गए।

कार्यशाला में सूरजपुर, कोरिया और मनेन्द्रगढ़ वनमंडल, गुरु घासीदास-तमोर पिंगला बाघ अभयारण्य तथा हाथी अभयारण्य और तमोर पिंगला वन्यजीव अभयारण्य के अधिकारी एवं मैदानी कर्मचारी शामिल हुए। उप वनमंडलाधिकारी, वन परिक्षेत्राधिकारी, उप वन परिक्षेत्राधिकारी, वनपाल, बीट रक्षक और बाघ अनुचर सहित विभिन्न स्तर के कर्मचारियों ने प्रशिक्षण लिया।

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दूसरे दिन जंगल में कराया प्रत्यक्ष अभ्यास

दूसरे दिन कोरिया वनमंडल के कटकोना कोलियरी-टेमरी बीट क्षेत्र में मैदानी प्रशिक्षण हुआ। यहां प्रशिक्षणार्थियों को बाघों की निगरानी और सुरक्षा की तकनीकों का प्रत्यक्ष अभ्यास कराया गया। बाघ अभयारण्य के बाहर बाघों की निगरानी के लिए स्वचालित कैमरे लगाने और उनकी निगरानी, गश्ती एवं आंकड़ा संकलन के लिए एम-स्ट्राइप्स गश्ती मोबाइल प्रणाली के उपयोग का प्रशिक्षण दिया गया। इसके अलावा मवेशियों के शिकार की पहचान एवं अभिलेखन, बाघ के पगमार्क और मल के विज्ञानी विश्लेषण, जंगल में अवैध फंदों की तलाश के लिए फंदा-रोधी पैदल गश्त तथा नियमित और व्यवस्थित पैदल गश्त की तकनीक सिखाई गई।

आधुनिक उपकरणों के साथ मजबूत होगी निगरानी

प्रशिक्षण में मैदानी अमले की सुरक्षा और प्रभावी कार्य निष्पादन पर भी विशेष जोर दिया गया। स्वचालित कैमरा, वायरलेस सेट, टॉर्च, दस्ताने, पशु चिकित्सा किट और बाघ अनुचरों के पहचान-पत्र जैसे आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराने तथा उनके समुचित उपयोग की जानकारी दी गई। कार्यशाला के प्रमुख सत्रों का संचालन छत्तीसगढ़ राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य एवं सरगुजा हाथी अभयारण्य के उप निदेशक गौरव निहलानी ने किया। उन्होंने बाघ निगरानी की आधुनिक तकनीक, वन क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और गश्त के दौरान अपनाई जाने वाली वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक प्रक्रियाओं की विस्तार से जानकारी दी।

ग्रामीणों और बच्चों को भी संरक्षण अभियान से जोड़ने पर जोर

प्रशिक्षण में यह भी स्पष्ट किया गया कि बाघ संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय की भागीदारी से ही इसे स्थायी रूप से मजबूत किया जा सकता है। ग्रामीणों, चरवाहों और स्कूली बच्चों को वन्यजीव संरक्षण गतिविधियों से जोड़ने, स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित बाघ अनुचर तैयार करने तथा ‘बाघ चौपाल’ जैसे जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों में बाघ संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया गया।