इलेक्शन डेस्क, इंदौर। मध्यप्रदेश की राजनीति में परम्परागत रूप से दिग्विजय सिंह से माधवराव सिंधिया की राजनैतिक प्रतिद्वंदिता रही है। सन् 1993 में जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने उस समय माधवराव सिंधिया का भी नाम मुख्यमंत्री बनने वालों में शीर्ष पर था। ऐसा कहा जाता है कि उस समय अर्जुन सिंह के लोगों ने माधवराव को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने को तैयार रहने के लिए कहा था।
इसी दौरान माधवराव ने घोषणा की थी कि वह दिग्विजय सिंह का समर्थन नहीं करेंगे, क्योंकि दिग्विजय सिंह न तो विधानसभा का चुनाव लड़े हैं न ही इसके वे सदस्य हैं। माधवराव संभवतः अपनी रियासत के छोटे से राजा को मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहते थे, ऐसी उस समय चर्चा रहती थी। सिंधिया का मुख्यमंत्री न बन पाना एक समय कांग्रेस में बड़ा गर्म मुद्दा हुआ करता था। जो कि आज भी सबसे बड़ा मुद्दा है और 2020 में शायद कांग्रेस सरकार गिरने का यही कारण था। माधवराव भी जीवन पर्यन्त इस घाव को भुला नहीं पाए।
वरिष्ठ पत्रकार दीपक तिवारी अपनी किताब 'राजनीतिनामा मध्यप्रदेश (1956 से 2003, कांग्रेस युग) में लिखते हैं कि, उस समय माधवराव के एक खास सिपहसलार अमर सिंह हुआ करते थे। वही अमर सिंह जो समाजवादी पार्टी के विवादास्पद महासचिव रहे है। अमर सिंह के मुताबिक माधवराव और अर्जुन सिंह के बीच एक राजनैतिक समझौता हुआ था कि माधवराव को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाएगा और अर्जुन सिंह दिल्ली में राजनैतिक पारी खेलेंगे। प्लान यह था कि विवाद की स्थिति में अर्जुन सिंह, माधवराव को सहमति का उम्मीदवार बनाकर पेश करेंगे, क्योंकि सिंधिया मराठा मध्यप्रदेश में अधिकारिक रूप से पिछड़े वर्ग में सम्मिलित हैं।
अमर सिंह ने माधवराव सिंधिया की आत्मकथा में वीर संघवी को बताया कि वे अर्जुन सिंह के इस वायदे पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने माधवराव को भोपाल तब तक नहीं जाने की सलाह दी जब तक कि विधायक दल में सब कुछ तय न हो जाए। उस समय एक चार्टड हवाई जहाज दिल्ली में तैयार रखा हुआ था, जिसमें माधवराव भोपाल शपथ लेने के लिए जाने वाले थे।
माधवराव राव इंतजार करते रहे और दिग्विजय सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया गया। ये दूसरा मौका था जब माधवराव सीएम बनते-बनते रह गए। तब दिग्विजय के समर्थन में कमलनथ भी शामिल थे। बाद में जो मंत्रिमंडल बना उसमें 35 में से 24 मंत्री अर्जुन सिंह गुट के थे। नौ शुक्ल गुट के जबकि सिंधिया के केवल दो मंत्री ही बनाए गए।
(Source: नईदुनिया नेटवर्क की पुरानी खबरों एवं मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार दीपक तिवारी की किताब राजनीतिनामा मध्यप्रदेश से साभार)