
मनोरंजन डेस्क। हर साल बॉलीवुड सैकड़ों गाने रिलीज करता है। कुछ गाने सोशल मीडिया पर ट्रेंड करते हैं, कुछ फिल्मों की सफलता के साथ हिट हो जाते हैं, तो कुछ समय बीतने के बाद लोगों की प्लेलिस्ट से गायब भी हो जाते हैं। लेकिन छठ के कुछ गीत ऐसे हैं, जिन्हें किसी फिल्म, बड़े स्टार या म्यूजिक प्रमोशन की जरूरत नहीं पड़ी। छठ का नाम आते ही इनकी धुन घरों, बाजारों और घाटों पर सुनाई देने लगती है। खासकर शारदा सिन्हा की आवाज में गाए गीत। इन गानों को सुनकर किसी को अपना गांव याद आता है, किसी को मां के साथ छठ की तैयारी और किसी को बचपन में घाट जाने के दिन।
दिलचस्प बात यह है कि इन गीतों की लोकप्रियता सिर्फ संगीत तक सीमित नहीं है। इनके बोलों में छठ की परंपरा, परिवार, प्रकृति और लोकजीवन की ऐसी तस्वीर मिलती है, जो फिल्मों के गानों से अलग अपनी पहचान बनाती है।
शारदा सिन्हा का नाम आते ही सबसे पहले ‘केलवा के पात पर उगेलन सूरजमल झांके-झुके’ याद आता है। इस गीत में केले के पत्ते और सूर्य देव की उपासना का जिक्र है। इसकी खासियत यह है कि इसमें छठ की पूजा का दृश्य किसी फिल्मी कहानी की तरह नहीं, बल्कि घर-आंगन में होने वाली वास्तविक परंपरा की तरह सामने आता है।
इसी तरह ‘पहिले-पहिल छठी मईया’ गीत उन लोगों की भावनाओं को आवाज देता है, जो पहली बार यह व्रत कर रहे होते हैं। पहली बार पूजा करने की उत्सुकता, मन में श्रद्धा और परंपरा को सही तरीके से निभाने की चिंता, इसके बोलों में महसूस होती है।
‘हो दीनानाथ’ भी छठ के लोकप्रिय गीतों में शामिल है। इसमें सूर्य देव से प्रार्थना और परिवार की खुशहाली की कामना दिखाई देती है। वहीं ‘मारबो रे सुगवा धनुष से’ जैसे लोकगीतों में प्रकृति और पूजा से जुड़ी मान्यताओं की झलक मिलती है।
छठ के गीतों को लोकप्रिय बनाने में अनुराधा पौडवाल का भी बड़ा योगदान रहा है। ‘उग हे सूरज देव’ और ‘कांच ही बांस के बहंगिया’ जैसे गीत छठ के दौरान खूब सुनाई देते हैं। ‘कांच ही बांस के बहंगिया’ में बांस की बहंगी और पूजा के सामान का जिक्र है। यह वही बहंगी है, जिसमें व्रती और उनके परिवार के लोग प्रसाद लेकर घाट तक पहुंचते हैं।
इन गीतों की खासियत यह है कि इनके लिए किसी बड़े फिल्मी सेट या कहानी की जरूरत नहीं होती। एक आवाज, पारंपरिक धुन और पूजा से जुड़े शब्द ही इन्हें लोगों के दिलों तक पहुंचा देते हैं।
बॉलीवुड के गाने अक्सर किसी किरदार, कहानी या फिल्म से जुड़े होते हैं। फिल्म रिलीज होती है, गाना लोकप्रिय होता है और फिर अगली फिल्म के गाने उसकी जगह ले लेते हैं। लेकिन छठ के गीतों का रिश्ता किसी एक फिल्म या कलाकार तक सीमित नहीं है। ये पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा हैं।
इन गीतों को सुनते हुए लोगों को सिर्फ पूजा याद नहीं आती, बल्कि अपने घर के लोग, गांव की गलियां, घाट की रौनक और परिवार के साथ बिताए पल भी याद आते हैं। यही वजह है कि बिहार, झारखंड और पूर्वांचल से बाहर रहने वाले लोग भी छठ के दिनों में इन गीतों को सुनकर अपने घर से जुड़ाव महसूस करते हैं।
शारदा सिन्हा की आवाज को इस परंपरा से अलग करके देखना भी मुश्किल है। उनके गीतों ने छठ की लोकसंस्कृति को देशभर में पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उनके लिए ये सिर्फ गाने नहीं थे, बल्कि लोकजीवन और आस्था को संगीत के जरिए सहेजने का माध्यम थे। यही वजह है कि छठ के मौके पर उनकी आवाज आज भी लोगों को अपनेपन का एहसास कराती है।
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