
एंटरटेनमेंट डेस्क। डिजिटल क्रांति के इस दौर में सूचनाओं की उपलब्धता भले ही बेहद आसान हो गई हो, लेकिन सच और झूठ के बीच का अंतर समझना आज की युवा पीढ़ी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम रील्स, ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) युवाओं के नजरिए को तेजी से बदल रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि देश की नई पौध के मानसिक और नैतिक विकास को केवल डिजिटल एल्गोरिदम के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
युवाओं में सही-गलत की पहचान, नैतिक मूल्य और तार्किक सोच (क्रिटिकल थिंकिंग) विकसित करने के लिए परिवार, शिक्षकों और समाज को सामूहिक रूप से आगे आना होगा। यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष 'रजनीगंधा प्रेजेंट्स जागरण फिल्म फेस्टिवल' के दौरान "युवा मन की रचना किसके हाथ" विषय पर आयोजित एक विशेष परिचर्चा में सामने आया।
दैनिक जागरण के ओखला कार्यालय में आयोजित इस विमर्श में शिक्षाविदों ने स्पष्ट किया कि हम आधुनिक तकनीक से मुंह नहीं मोड़ सकते, लेकिन युवाओं को इसका सही और रचनात्मक उपयोग सिखाना बेहद जरूरी है। भारतीय ज्ञान परंपरा, आपसी बातचीत और जीवन मूल्यों से जोड़कर ही एक जिम्मेदार पीढ़ी का निर्माण संभव है।
दयाल सिंह कॉलेज के इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर फिरोज आलम ने कहा कि अतीत में जहां महापुरुष और गुरु युवाओं के रोल मॉडल होते थे, आज उनकी जगह सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने ले ली है। डिजिटल माध्यमों ने शिक्षा का विस्तार तो किया है, लेकिन इसने युवाओं में अकेलापन और संवादहीनता भी बढ़ाई है। रील्स केवल सूचनाएं देती हैं, विवेक नहीं।
किरोड़ीमल कॉलेज के हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वेद प्रकाश ने चिंता जताते हुए कहा कि युवा अपना कीमती समय स्क्रीन पर बिता रहे हैं, जबकि उनका मानसिक विकास किताबों और अच्छे संस्कारों से होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे देश के महानायक रील्स देखकर नहीं, बल्कि जमीनी संघर्षों और सनातन मूल्यों से तैयार हुए थे।
परिचर्चा में शामिल अन्य विशेषज्ञों ने भी इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव पर अपने विचार साझा किए:
आज इंटरनेट मीडिया एक ऐसी अदृश्य यूनिवर्सिटी (Invisible University) बन चुका है, जो बिना किसी नियंत्रण के युवाओं की राजनीतिक और सामाजिक सोच को लगातार प्रभावित कर रहा है। ऐसे में ट्रोलिंग और मीम संस्कृति के बीच कंटेंट क्रिएटर्स को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझनी होगी।- डॉ. अनंत प्रकाश, असिस्टेंट प्रोफेसर (राजनीति विज्ञान), किरोड़ीमल कॉलेज
श्री अरबिंदो कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. हंसराज सुमन और श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर ऋत्विक भट्टाचार्जी ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार को ओटीटी जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए कड़े मानक तय करने चाहिए, ताकि सकारात्मक कंटेंट को बढ़ावा मिल सके।
शारदा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर राशिद हाशमी ने एक नया दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि युवाओं को तकनीक के जाल से बाहर निकालने के लिए समय-समय पर 'डिजिटल उपवास' (Digital Fasting) यानी स्क्रीन से दूरी बनाने की आदत डालनी होगी।
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अंत में, आर्यभट्ट कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राम आनंद शर्मा ने कहा कि यदि हमें वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के संकल्प को पूरा करना है, तो युवाओं के मानस को सही दिशा देनी ही होगी। इस सार्थक सत्र का कुशल संचालन पीजीडीएवी कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. श्रुति रंजना मिश्रा द्वारा किया गया।