
मनोरंजन डेस्क। हॉलीवुड को कौन नहीं जानता, दुनिया की सबसे ग्लैमरस फिल्म इंडस्ट्री जो अमेरिका के कैलिफोर्निया के लास एंजिलिस में है। ये सिर्फ एक जगह नहीं है, बल्कि ये सिनेमा, ग्लैमर और ग्लोबल एंटरटेनमेंट के लिए बहुत जरूरी है। अगर नेटवर्थ की बात करें तो ये करीब 8 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा मानी जाती है।
इस इंडस्ट्री को सौ साल पूरे होने वाले हैं। इस बीच कई फिल्में बनीं। हर साल यहां करीब 650 से 700 फिल्में बनाई जाती है। एवरेज निकालें तो हर दिन करीब 2 फिल्में। कई फिल्मों ने तो लोगों के सिनेमा को लेकर सोच को ही बदल दिया। चाहे वो मार्वल जैसी सुपरहीरो फ्रेंचाइजी हो या टाइटैनिक जैसा इमोशनल ड्रामा- हॉलीवुड ने हर जॉनर में ऑडियंस को कुछ नया ही दिखाया है।
आज जब हम मल्टीप्लेक्स, ओटीटी, ब्लॉकबस्टर और टेक्नोलॉजी के बीच हैं। ऐसे में यह जानना भी जरूरी है कि हॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री शुरू कैसे हुई। कैसे 1914 में एक साइलेंट फिल्म से शुरुआत कर ये सबसे बड़ी इंडस्ट्री में से एक बन गई। साथ ही कैसे इसने इंडियन सिनेमा को भी शेप देने में मदद की है।
हॉलीवुड की शुरुआत 20वीं सदी में हुई। इस दौरान अमेरिका में फिल्म मेकिंग खास तौर पर न्यूयॉर्क और शिकागो में ही की जाती थी। लेकिन वहां थॉमस एडिसन की मोशन पिक्चर पेटेंट कंपनी के डॉमिनेंस की वजह से कोई फिल्ममेकर इंडिपेंडेंट तौर पर काम नहीं कर पा रहा था।
इसके बाद सभी ने मिल कर कैलिफोर्निया का एक छोटा और शांत इलाका खोजा- हॉलीवुड। ये जगह लास एंजिलिस के बहुत करीब थी।
इसके बाद कैलिफोर्निया की अच्छी धूप, खूबसूरत लोकेशन और अच्छे रिसोर्सेज की वजह से फिल्ममेकर यहीं बसने लगे। 1910 में हॉलीवुड में पहली बार फिल्म शूट की गई और 1911 में पहला स्टूडियो खुला। इसके बाद हॉलीवुड बहुत तेजी से फिल्म मेकिंग का ग्लोबल हब बन गया।
पहले जब हॉलीवुड की शुरुआत हुई तो इसे हॉलीवुडलैंड के नाम से जाना जाता था। 1923 में हॉलीवुडलैंड का साइन बोर्ड लगाया गया। इसे एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए लगाया गया था। इसके साथ उसे सजाने के लिए 3700 बल्ब भी लगाए थे। लेकिन बाद में 1949 में इसका नाम हॉलीवुडलैंड से हॉलीवुड कर दिया गया।
हॉलीवुड की पहली फुल लेंथ फिल्म ‘दी स्कौ मैन’ (The Squaw Man) थी। ये साइलेंट फिल्म थी। इसे 1914 में बनाया गया। इसके साथ ये हॉलीवुड में शूट होने वाली पहली फीचर फिल्म भी थी। इस फिल्म का डायरेक्शन सेसिल बीडी मिले ने किया। इसके बाद हॉलीवुड को एक नई पहचान मिली।
भारत में 1913 में ही पहली फिल्म राजा हरिशचंद्र आ चुकी थी। इसका डायरेक्शन दादा साहब फाल्के ने किया था।
धीरे-धीरे हॉलीवुड ने टेक्नोलॉजी पर काम किया और 1927 में पहली टॉकी यानी ऑडियो-विजुअल फिल्म आई। इस फिल्म में डायलॉग का इस्तेमाल किया गया था। साथ ही उसे म्यूजिक के साथ अच्छी तरह सिंक्रोनाइज भी किया गया। फिल्म का नाम था ‘दी जैज सिंगर’। इस दौरान ये फिल्म बहुत फेमस हुई और इंडस्ट्री का एक नया दौर शुरू हुआ। भारत में पहली टॉकी फिल्म 1931 में आई आलमआरा थी।
हालांकि पहली टेक्नीकलर फिल्म 1917 में आई दी गल्फ बिटवीन (The Gulf Between) थी। लेकिन ये सक्सेसफुल नहीं रही। असल में कलर फिल्मों का समय 1939 में शुरू हुआ, जब दो बड़ी और ऐतिहासिक फिल्में ‘The Wizard of Oz’ और ‘Gone with the Wind’ रिलीज हुई।
इन फिल्मों ने ऑडियंस को एक नई और कलरफुल दुनिया से परिचित कराया। खासतौर पर "The Wizard of Oz" को याद किया जाता है। इस फिल्म में ब्लैक एंड व्हाइट और कलरफुल सीन्स का कॉम्बिनेशन था।
जब The Wizard of Oz की शूटिंग चल रही थी, तो एक्टर्स को स्टूडियो की गर्मी और भारी कॉस्ट्यूम की वजह से बार-बार कपड़े बदलने पड़ते थे।
2024 में हॉलीवुड की नेट वर्थ 95 से 100 अरब डॉलर के बीच, यानी लगभग 8 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा थी।
इसमें बॉक्स ऑफिस कलेक्शन, स्ट्रीमिंग रेवेन्यू (Netflix, Disney+, etc.), मर्चेंडाइजिंग, राइट्स सेलिंग और थीम पर्क्स से मिला कलेक्शन भी शामिल हैं। हालांकि कोविड-19 के बाद इसमें कुछ गिरावट आई थी, लेकिन OTT प्लेटफॉर्म्स के चलते फिर से ग्रोथ शुरू हो गई है।
आज हम जो हॉलीवुड फिल्मों में सुपर हीरो, उड़ती कारें, समय में पीछे जाते किरदार और दूसरी दुनिया के लोग देखते हैं- उनके पीछे कई साल का इनोवेशन छिपा है। हॉलीवुड ने सबसे पहले CGI (कंप्यूटर जेनरेटेड इमेजरी) और VFX को अपनाया था। इससे ‘जुरासिक पार्क’ जैसी फिल्मों में डायनासोर असली लगने लगे।
इसके बाद आया IMAX- एक ऐसा फॉर्मेट जो स्क्रीन पर हर सीन को इतना बड़ा और डीटेल्ड दिखाता है कि ऑडियंस खुद को कहानी के बीच महसूस करने लगे।
जब भारत में फिल्म मेकिंग की शुरुआत हुई, उस समय हॉलीवुड ग्लोबल स्केल पर काम कर रहा था। चार्ली चैपलिन की फिल्मों को देखकर दादा साहब फाल्के ने राजा हरिश्चंद्र बनाई, जो भारत की पहली फिल्म बनी।
इसके साथ हॉलीवुड के स्टूडियो सिस्टम से सीख कर भारत में बॉम्बे टॉकीज और प्रभात स्टूडियो की शुरुआत की गई। इसके बाद हॉलीवुड की मेकअप, सेट डिजाइन, स्क्रिप्ट, कैमरा एंगल, लाइटिंग जैसी तकनीक धीरे-धीरे भारत में भी आने लगीं। भारतीय फिल्म तकनीशियन जैसे विट्ठलदास जानी और नितिन बोस ने यूरोप-अमेरिका जाकर ट्रेनिंग ली। इसके बाद उन्होंने भारत में एडिटिंग और साउंड मिक्सिंग की शुरुआत की।
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