
मनोरंजन डेस्क। फिल्म देखते समय ऑडियंस को लगता है कि कहानी जैसी लिखी गई होगी, पर्दे पर भी वैसी ही दिखाई गई होगी। लेकिन असल में फिल्म की कहानी कैमरे के सामने जितनी बनती है, उतनी ही एडिटिंग टेबल पर भी तैयार होती है। शूटिंग के दौरान फिल्माए गए कई सीन फाइनल फिल्म में जगह नहीं बना पाते। कहीं किसी किरदार का हिस्सा छोटा कर दिया जाता है, तो कहीं कहानी का क्रम बदल दिया जाता है। कभी-कभी एक छोटा-सा कट किसी सीन का पूरा मतलब बदल देता है।
यही वजह है कि फिल्म एडिटिंग को केवल फुटेज काटने और जोड़ने का काम नहीं माना जाता। यह कहानी कहने की एक अहम कला है, जिसमें एडिटर और डायरेक्टर मिलकर तय करते हैं कि दर्शक क्या देखेंगे, कितनी देर तक देखेंगे और उस दृश्य को किस नजरिए से समझेंगे।
मान लीजिए किसी फिल्म में एक किरदार गुस्से में किसी दूसरे व्यक्ति को थप्पड़ मार देता है। शूटिंग में इसके बाद एक ऐसा सीन भी फिल्माया गया, जिसमें वह अपने किए पर पछताता है। अगर एडिटिंग के दौरान पछतावे वाला सीन हटा दिया जाए, तो ऑडियंस को वह किरदार निर्दयी लग सकता है। लेकिन अगर वह सीन रखा जाए, तो दर्शक उसके गुस्से के पीछे छिपी मजबूरी या भावनाओं को भी समझ सकते हैं।
यानी अभिनय वही है, घटनाएं भी वही हैं, लेकिन एडिटिंग बदलने से ऑडियंस की राय बदल सकती है। एडिटर के पास एक ही सीन के कई टेक और अलग-अलग कैमरा एंगल होते हैं। इनमें से किस हिस्से को चुना जाए और किसे हटाया जाए, यह फैसला कहानी के असर को प्रभावित करता है।
फिल्म की एडिटिंग उसके जॉनर के हिसाब से भी बदलती है। हॉरर या थ्रिलर में किसी दरवाजे, खाली कमरे या किरदार के चेहरे पर कुछ सेकंड ज्यादा ठहरना डर बढा सकता है। अगर एडिटर तुरंत अगला सीन दिखा दे, तो वही ड़र खत्म हो सकता है। इसी तरह तेज कट्स और अचानक बदलते दृश्यों से बेचैनी या घबराहट पैदा की जा सकती है।
कॉमेडी में भी एडिटिंग की अहम भूमिका होती है। कई बार किसी मजेदार डायलॉग के बाद कलाकार के चेहरे पर कुछ पल रुकना ही हंसी पैदा करता है। अगर अगला शॉट बहुत जल्दी आ जाए, तो पंचलाइन का असर कम हो सकता है।
एडिटिंग में शॉट की लंबाई, सीन का क्रम और संगीत की टाइमिंग ऑडियंस की भावनाओं को दिशा देते हैं। एडिटर को यह समझना होता है कि किस पल कहानी को तेज करना है और कहां ऑडियंस को ठहरकर सोचने का मौका देना है।
फिल्म की शूटिंग आमतौर पर कहानी के क्रम में नहीं होती। लोकेशन, कलाकारों की उपलब्धता और प्रोड़क्शन की जरूरतों के कारण अलग-अलग दिनों में अलग-अलग हिस्से फिल्माए जाते हैं। एडिटर इन सभी फुटेज को जोड़कर कहानी का क्रम तैयार करता है। शुरुआती एड़िट में कई ऐसे सीन भी शामिल हो सकते हैं, जिन्हें बाद में हटाना पड़ता है।
कभी फिल्म की रफ्तार बनाए रखने के लिए कोई सबप्लॉट छोटा कर दिया जाता है, तो कभी किसी किरदार की कहानी समझाने वाला दृश्य हटा दिया जाता है। इससे फिल्म की अवधि कम हो सकती है, लेकिन उसके भावनात्मक असर पर भी फर्क पड़ सकता है। अंतिम फैसला डायरेक्टर, एडिटर और कई बार निर्माता की जरूरतों के बीच तय होता है।
इसका मतलब यह नहीं कि एडिटर अकेले पूरी कहानी बदल देता है। फिल्म का अंतिम रूप कई लोगों के सहयोग से बनता है। लेकिन एडिटिंग वह चरण है जहां शूट किए गए दृश्यों को एक निश्चित अर्थ और गति मिलती है।
फिल्म के पर्दे पर आने से पहले एडिटिंग टेबल पर कई संभावनाएं खत्म होती हैं और एक कहानी चुनी जाती है। दर्शक उसी कहानी को देखते हैं, लेकिन उसके पीछे उन तमाम दृश्यों की भी भूमिका होती है, जो फाइनल फिल्म का हिस्सा नहीं बन पाए।
यह भी पढ़ें- सलमान ने स्काउट को कहा ‘घटिया आदमी’, लव गिल का सपोर्ट न करने पर भी सवाल उठाए; पूछा- आप किसके साथ लॉयल?