
एंटरटेनमेंट डेस्क। बॉलीवुड की हॉरर फिल्मों में कुछ किरदार ऐसे होते हैं, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी ऑडियंस के दिमाग में बने रहते हैं। साल 2018 में रिलीज हुई Tumbbad का हस्तर भी ऐसा ही किरदार है। उसका डरावना चेहरा, असामान्य शरीर और अंधेरी दुनिया फिल्म को दूसरी हॉरर फिल्मों से अलग बनाते हैं। लेकिन पर्दे पर दिखाई देने वाले इस काल्पनिक जीव को तैयार करने के पीछे काफी प्रयोग और तकनीकी मेहनत लगी थी।
फिल्म के प्रोड्यूसर-एक्टर सोहम शाह के एक इंटरव्यू के मुताबिक, हस्तर का लुक तैयार करने के लिए शुरुआत में प्रोस्थेटिक्स का इस्तेमाल करने की कोशिश की गई थी। साल 2012-13 के दौरान और फिर 2015 में उसके अलग-अलग लुक पर काम हुआ, लेकिन टीम को मनचाहा रिजल्ट नहीं मिला। इसके बाद हस्तर को कंप्यूटर जनरेटेड इमेजरी यानी CGI और विजुअल इफेक्ट्स (VFX) की मदद से पर्दे पर उतारने का फैसला किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में किरदार की डिजाइन से लेकर उसके हाव-भाव और फिल्म के माहौल तक पर काम किया गया।
प्रोस्थेटिक्स फिल्म मेकिंग की वह तकनीक है, जिसमें कलाकार के चेहरे और शरीर पर नकली हिस्से लगाए जाते हैं। इनकी मदद से चेहरे की बनावट, त्वचा, झुर्रियां और शरीर का आकार बदलकर किसी काल्पनिक जीव या किरदार का रूप तैयार किया जा सकता है।
Tumbbad में भी शुरुआत में इसी तरीके से हस्तर को तैयार करने की कोशिश हुई। लेकिन टीम को ऐसा लुक नहीं मिल पा रहा था, जो किरदार की कल्पना से मिलता जुलता हो। इसके अलावा, भारी प्रोस्थेटिक मेकअप के साथ एक्टर को भी काम करने में दिक्कत हो सकती थी।
कई दिन की महनत के बाद मेकर्स ने महसूस किया कि हस्तर के रूप और उसकी गतिविधियों को बेहतर तरीके से दिखाने के लिए डिजिटल तकनीक ज्यादा कारगर हो सकती है। इसी वजह से CGI का सहारा लेने का फैसला किया गया।
CGI यानी कंप्यूटर जनरेटेड इमेजरी की मदद से कंप्यूटर पर किसी काल्पनिक किरदार, वस्तु या दृश्य का मेकिंग किया जाता है। वहीं, VFX के जरिए वास्तविक फुटेज में डिजिटल इफेक्ट्स जोड़े जाते हैं या उसमें बदलाव किए जाते हैं।
Tumbbad में हस्तर को डिजिटल रूप से तैयार करने से उसके चेहरे, शरीर और मूवमेंट पर ज्यादा नियंत्रण मिला। फिल्म की एडिटर और क्रिएटिव प्रोड्यूसर संयुक्ता काजा से जुड़े इंटरव्यू में बताया गया था कि शूटिंग के दौरान कलाकार के मूवमेंट और भावों को रिकॉर्ड किया गया, जिनके आधार पर डिजिटल किरदार की गतिविधियों को तैयार करने में मदद मिली।
इस तकनीक का फायदा यह था कि हस्तर को सिर्फ डरावना दिखाने के बजाय उसकी हरकतों और उपस्थिति को फिल्म के माहौल के अनुरूप बनाया जा सकता था। इससे वह सामान्य मेकअप वाले किरदार के बजाय एक अलग तरह का काल्पनिक जीव नजर आया।
हस्तर का डर केवल उसके चेहरे या शरीर से पैदा नहीं होता। फिल्म में दिखाई देने वाला अंधेरा, लाल रंग का माहौल, बारिश और रहस्यमयी भूमिगत संरचना भी उसके किरदार को प्रभावशाली बनाती है।
फिल्म के सिनेमैटोग्राफर पंकज कुमार ने फिल्म के लिए ऐसा दृश्य संसार तैयार करने पर काम किया, जिसमें प्राकृतिक रोशनी, गहरे रंग और परछाइयां कहानी के तनाव को बढ़ाएं। महाराष्ट्र के सासवड और सतारा के आसपास लोकेशन तलाशने के साथ-साथ कई हिस्सों के लिए सेट भी तैयार किए गए।
फिल्म में देवी के गर्भ जैसी संरचना और उसके भीतर दिखाई जाने वाली दुनिया को कहानी के अनुरूप बनाने के लिए प्रोडक्शन डिजाइन पर खास ध्यान दिया गया। यहां कैमरे की स्थिति, रोशनी और सेट की बनावट मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिसमें दर्शक लगातार किसी अनहोनी की आशंका महसूस करते हैं।
Tumbbad की मेकिंग प्रक्रिया भी काफी लंबी रही। सोहम शाह के मुताबिक, फिल्म को तैयार करने में करीब छह साल लगे। इसकी कहानी और पटकथा पर काम करने, शूटिंग की योजना बनाने, लोकेशन तलाशने और फिल्म के दृश्य संसार को तैयार करने में समय लगा।
फिल्म के लिए बारिश और बादलों से भरा माहौल भी अहम था। इसलिए प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप शूटिंग करना आसान नहीं था। इसके अलावा, हस्तर जैसे किरदार को डिजिटल रूप से तैयार करने और उसे फिल्म के बाकी दृश्यों के साथ स्वाभाविक तरीके से जोड़ने में भी तकनीकी मेहनत लगी।
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