
मनोरंजन डेस्क | हिंदी सिनेमा में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जो वक्त के साथ पुरानी नहीं पड़तीं। किशोर कुमार उन्हीं में से एक हैं। कभी ‘रूप तेरा मस्ताना’ से रोमांस का रंग जमाया, तो कभी ‘मेरे सपनों की रानी’ से प्यार को आवाज दी। उनकी गायकी में मस्ती भी थी, दर्द भी और ऐसा अंदाज भी, जिसकी नकल करना आसान नहीं था।
लेकिन इस सदाबहार गायक की जिंदगी का एक किस्सा आज भी लोगों को हैरान करता है। हजारों गाने गाने, एक्टिंग करने और फिल्में बनाने वाले किशोर कुमार को कभी नेशनल फिल्म अवॉर्ड नहीं मिला। मई 2025 में उनके बेटे अमित कुमार ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता की फिल्म दूर गगन की छांव में राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए विचाराधीन थी, लेकिन कथित तौर पर नामांकन के बदले रिश्वत मांगी गई थी। किशोर कुमार ने पैसे देने से इनकार कर दिया था। यह दावा उनके बेटे ने किया था।
किशोर कुमार की कहानी सिर्फ उनकी आवाज तक सीमित नहीं है। मध्यप्रदेश के खंडवा में बीता उनका बचपन, मुंबई पहुंचने का सफर और अपने शहर से उनका लगाव भी उनकी जिंदगी के खास हिस्से हैं।
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किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश के खंडवा में हुआ था। उनका असली नाम आभास कुमार गांगुली था। उनके पिता कुंजलाल गांगुली पेशे से वकील थे, जबकि उनकी मां गौरी देवी गृहिणी थीं। वह परिवार में चार भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के मशहूर एक्टर बने, जबकि अनूप कुमार ने भी फिल्मों में काम किया।
किशोर कुमार का बचपन खंडवा के पुश्तैनी घर में बीता। उस दौर में शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह बच्चा आगे चलकर भारतीय संगीत की सबसे यादगार आवाजों में शामिल होगा। किशोर को बचपन से ही गाने और एक्टिंग में दिलचस्पी थी। उन्होंने आगे चलकर अपनी अलग गायकी और कॉमेडी से पहचान बनाई।
उनका खंडवा से रिश्ता इतना गहरा था कि कामयाबी मिलने के बाद भी वह अपने शहर को नहीं भूले। वह अक्सर कहा करते थे- दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे। यह बात उनके शहर के प्रति लगाव को दिखाती है। आज भी खंडवा में उनके प्रशंसक जन्मदिन पर उनकी याद में दूध-जलेबी चढ़ाते हैं और उनके गाने गाकर उन्हें याद करते हैं।
किशोर कुमार के गानों की कुल संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। कई जीवनी और संगीत से जुड़ी रिपोर्टों में उनके गाए गानों की संख्या 2,500 से ज्यादा बताई गई है। इसलिए 1,900 गानों का आंकड़ा निश्चित संख्या के रूप में लिखना सही नहीं होगा। उन्होंने हिंदी के अलावा बंगाली, मराठी, गुजराती, असमिया, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम और ओड़िया समेत कई भाषाओं में गाने गाए।
उनकी आवाज की सबसे खास बात यह थी कि वह हर तरह के गाने में ढल जाती थी। रोमांटिक गीत हों, दर्द भरे नगमे हों या मस्ती से भरे गाने- किशोर दा हर अंदाज में अलग सुनाई देते थे।
किशोर कुमार सिर्फ गायक नहीं थे। वह अभिनेता, संगीतकार, निर्माता और डायरेक्टरभी थे। 1964 में उन्होंने फिल्म ‘दूर गगन की छांव में’ बनाई, जिसमें उन्होंने खुद मुख्य भूमिका निभाई और उनके बेटे अमित कुमार ने भी काम किया। फिल्म में एक पिता और उसके मूक बेटे की भावनात्मक कहानी दिखाई गई थी। किशोर कुमार ने फिल्म का निर्देशन और निर्माण भी किया था।
मई 2025 में पत्रकार विक्की लालवानी के साथ बातचीत में अमित कुमार ने बताया कि इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए विचाराधीन माना जा रहा था। उनके मुताबिक, दिल्ली में मंत्रालय से जुड़े किसी व्यक्ति ने किशोर कुमार को फोन करके कहा था कि अगर वह कुछ पैसे दें, तो फिल्म को पुरस्कार के लिए नामांकित कराया जा सकता है।
अमित के अनुसार, किशोर कुमार ने इस मांग को ठुकरा दिया। उनका कहना था कि फिल्म पहले ही सफल हो चुकी है और उन्हें पुरस्कार के लिए पैसे देने की जरूरत नहीं है।
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अमित ने यह भी बताया कि फिल्म मुंबई के सुपर सिनेमा में 23 हफ्तों तक चली थी और दिल्ली-उत्तर प्रदेश में भी इसे अच्छी सफलता मिली थी। बाद में इसके अधिकार एक तमिल फिल्म निर्माता को बेच दिए गए। फिल्म का तमिल रीमेक ‘रामू’ नाम से बना, जिसने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता।
हालांकि, रिश्वत मांगने का यह किस्सा अमित कुमार के बयान पर आधारित है। इसे किसी आधिकारिक जांच से प्रमाणित घटना के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
किशोर कुमार को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भले ही नहीं मिला, लेकिन उनके काम को दूसरे बड़े सम्मानों से भी पहचान मिली। उन्होंने अपने करियर में बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर के लिए आठ फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते। इनमें ‘रूप तेरा मस्ताना’, ‘खाइके पान बनारस वाला’ और ‘पग घुंघरू बांध’ जैसे लोकप्रिय गानों के लिए मिले पुरस्कार शामिल हैं।
मध्यप्रदेश सरकार ने भी उन्हें सम्मानित किया। साल 1985 में उन्हें लता मंगेशकर पुरस्कार दिया गया। बाद में, 1997 में मध्यप्रदेश सरकार ने हिंदी सिनेमा में योगदान देने वालों के लिए ‘किशोर कुमार पुरस्कार’ शुरू किया।
मुंबई में नाम और शोहरत मिलने के बाद भी किशोर कुमार अपने जन्मस्थान खंडवा को नहीं भूले। उनका मशहूर वाक्य- ‘दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे’- उनके इसी लगाव की याद दिलाता है। खंडवा में आज भी उनके प्रशंसक उनकी जयंती पर जुटते हैं, उनके गाने गाते हैं और दूध-जलेबी चढ़ाकर उन्हें याद करते हैं।
किशोर कुमार का निधन 13 अक्टूबर 1987 को मुंबई में हुआ था। आज भी उनके गाने रेडियो, फिल्मों और संगीत कार्यक्रमों में सुने जाते हैं। उनकी आवाज ने कई पीढ़ियों को जोड़कर रखा है और खंडवा का नाम भी देशभर में उनकी वजह से पहचाना जाता है।
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