
मनोरंज डेस्क। कभी-कभी फिल्मों की कहानियां पर्दे पर खत्म हो जाती हैं, लेकिन उनकी असली कहानी पर्दे के पीछे चलती रहती है। मीना कुमारी की फिल्म ‘पाकीजा’ भी ऐसी ही एक कहानी है। इसमें साहिबजान अपने प्यार को पाने के लिए संघर्ष करती है, लेकिन असल जिंदगी में इस किरदार को निभाने वाली मीना कुमारी भी रिश्तों की उलझनों से गुजर रही थीं। फिल्म के निर्देशक कमाल अमरोही उनके पति थे। दोनों के बीच आई दूरियों ने फिल्म की शूटिंग तक रोक दी थी। करीब 14 साल तक बनती रही इस फिल्म में जितना वक्त लगा, उतने ही उतार-चढ़ाव मीना और कमाल के रिश्ते में भी आए।
‘पाकीजा’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि कमाल अमरोही का बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट था। इसकी कल्पना 1950 के दशक के मध्य में की गई और 1958 में शूटिंग शुरू हुई। कमाल इसे बड़े पर्दे पर बेहद भव्य अंदाज में पेश करना चाहते थे। शुरुआत में फिल्म को ब्लैक एंड व्हाइट बनाने की योजना थी, लेकिन बाद में रंगीन फिल्मों का दौर आया तो उन्होंने इसे रंगीन बनाने का फैसला किया। फिर सिनेमास्कोप तकनीक का चलन बढ़ा और फिल्म के विजुअल्स को लेकर उनकी योजनाएं एक बार फिर बदल गईं। इन बदलावों ने भी फिल्म बनने में काफी समय लगा दिया।
फिल्म की मुश्किलें सिर्फ तकनीक और बजट तक सीमित नहीं थीं। मीना कुमारी और कमाल अमरोही के रिश्ते में भी तनाव बढ़ने लगा था। दोनों के बीच निजी मतभेद इतने बढ़े कि 1964 के आसपास फिल्म की शूटिंग रोकनी पड़ी। इसके बाद करीब चार से छह साल तक फिल्म पर काम लगभग ठप रहा।
दोनों के अलग रहने की खबरें सामने आती रहीं, लेकिन उनके रिश्ते को लेकर कई तरह की बातें भी कही गईं। कमाल अमरोही के बेटे ताजदार अमरोही ने बाद में बताया था कि दोनों के बीच अलगाव जरूर था, लेकिन उन्होंने तलाक नहीं लिया था। इस रिश्ते की असली स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे रहे हैं। इतना जरूर है कि दोनों के बीच आई दूरी का असर ‘पाकीजा’ पर साफ दिखाई दिया।
1968-69 के आसपास फिल्म को दोबारा शुरू करने की कोशिश हुई। अभिनेता सुनील दत्त और संगीतकार खय्याम ने भी मीना कुमारी को फिल्म अधूरी न छोड़ने के लिए मनाया। आखिरकार वह शूटिंग पर लौटीं। लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं थे। मीना कुमारी की सेहत लगातार बिगड़ रही थी। शराब की लत और लिवर सिरोसिस की बीमारी ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया था।
फिल्म में साहिबजान का किरदार एक तवायफ का था, जिसके लिए नृत्य और अदाओं की जरूरत थी। लेकिन मीना कुमारी की तबीयत ऐसी नहीं थी कि वह पहले की तरह लंबे डांस सीक्वेंस कर सकें। ऐसे में कुछ डांस दृश्यों में उनकी बॉडी डबल पद्मा खन्ना की मदद ली गई। कैमरे के क्लोजअप और मेकअप के जरिए दोनों के दृश्यों को इस तरह जोड़ा गया कि दर्शकों को अंतर महसूस न हो।
कई साल की मेहनत के बाद ‘पाकीजा’ 4 फरवरी 1972 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई। फिल्म में मीना कुमारी के साथ राज कुमार और अशोक कुमार भी अहम भूमिकाओं में थे। शुरुआत में फिल्म को वैसी प्रतिक्रिया नहीं मिली, जैसी उम्मीद की जा रही थी। लेकिन मीना कुमारी की तबीयत बिगड़ने और उनके निधन की खबर के बाद दर्शकों ने फिल्म को नए भाव से देखना शुरू किया।
31 मार्च 1972 को मीना कुमारी का निधन हो गया। वह फिल्म की रिलीज के करीब दो महीने बाद ही दुनिया छोड़ गईं। उनकी मौत के बाद ‘पाकीजा’ को देखने के लिए दर्शकों की भीड़ बढ़ने लगी और फिल्म धीरे-धीरे क्लासिक बन गई।
आज जब ‘पाकीजा’ में मीना कुमारी को साहिबजान के रूप में देखते हैं, तो उनकी आंखों में दिखाई देने वाली उदासी सिर्फ किरदार तक सीमित नहीं लगती। शायद यही वजह है कि फिल्म की कहानी और उसके पीछे की मीना-कमाल की दास्तान आज भी लोगों को आकर्षित करती है।
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