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मुगल-ए-आजम बनने में क्यों लगे 15 साल? बंटवारे से लेकर शीश महल तक, जानिए फिल्म के पीछे की कहानी

‘मुगल-ए-आजम’ को बनने में करीब 15 साल लगे। बंटवारे के बाद फाइनेंसर के चले जाने से शूटिंग रुकी और कलाकार भी बदले। के. आसिफ हर चीज असली चाहते थे, इसलिए शूटिंग कई बार टली। फिल्म 5 अगस्त 1960 को रिलीज हुई।

By Digital DeskEdited By: Akriti kumari
Publish Date: Mon, 02 Nov 2026 08:21:43 PM (IST)Updated Date: Mon, 02 Nov 2026 08:21:43 PM (IST)
मुगल-ए-आजम बनने में क्यों लगे 15 साल? बंटवारे से लेकर शीश महल तक, जानिए फिल्म के पीछे की कहानी
फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के शीश महल वाले यादगार दृश्य में अनारकली के किरदार में मधुबाला।

HighLights

  1. बंटवारे से रुकी फिल्म की शूटिंग
  2. शीश महल सेट बना यादगार
  3. 1.5 करोड़ में बनी महंगी फिल्म

मनोरंजन डेस्क। हिंदी सिनेमा में कुछ फिल्में सिर्फ पर्दे पर नहीं बनतीं, बल्कि उन्हें बनाने वाले लोग अपनी पूरी जिंदगी उनमें लगा देते हैं। के. आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ ऐसी ही एक मिसाल है। दिलीप कुमार, मधुबाला और पृथ्वीराज कपूर जैसे दिग्गज कलाकारों से सजी इस फिल्म को बनने में करीब 15 साल लगे।

आज भी जब भारतीय सिनेमा की सबसे भव्य फिल्मों की बात होती है, तो इसका नाम सबसे पहले लिया जाता है। लेकिन सवाल है कि आखिर एक फिल्म को बनाने में इतना लंबा समय क्यों लगा? क्या इसकी वजह सिर्फ बड़े-बड़े सेट और भारी-भरकम बजट थे या इसके पीछे कुछ ऐसी घटनाएं थीं, जिन्होंने इस फिल्म की पूरी कहानी बदल दी?


दरअसल, फिल्म की प्लानिंग 1940 के दशक में शुरू हुई थी। यह 5 अगस्त 1960 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई। इस लंबे सफर में देश का बंटवारा, आर्थिक संकट, कलाकारों में बदलाव और डायरेक्टर का हर छोटी चीज को परफेक्ट बनाने का जुनून शामिल था।

बंटवारे ने रोक दी शूटिंग, बदल गई फिल्म की पूरी स्टारकास्ट

फिल्म बनाने का सपना डायरेक्टर के. आसिफ ने 1944 के आसपास देखा था। शुरुआत में उन्होंने इसकी कास्टिंग भी कर ली थी। उस समय चंद्रमोहन को अकबर, नरगिस को अनारकली और डी.के. सप्रू को सलीम के किरदार के लिए चुना गया था।

लेकिन फिल्म की शूटिंग आगे बढ़ती, उससे पहले देश के इतिहास में बड़ा बदलाव हुआ। साल 1947 में भारत का बंटवारा हो गया। फिल्म के शुरुआती फाइनेंसर शिराज अली हकीम पाकिस्तान चले गए। इससे फिल्म के लिए पैसों का इंतजाम करना मुश्किल हो गया और प्रोजेक्ट बीच में ही रुक गया।

इसी दौरान फिल्म के शुरुआती अकबर यानी चंद्रमोहन का निधन हो गया। ऐसे में के. आसिफ को पूरी योजना नए सिरे से बनानी पड़ी। बाद में बिजनेसमैन शापूरजी पलोनजी ने फिल्म में इनवेस्ट किया। इसके बाद फिल्म को दोबारा शुरू किया गया और इस बार पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार और मधुबाला जैसे बड़े एक्टर्स को लोड रोल में लिया गया।

एक-एक चीज असली चाहिए थी, इसलिए महीनों रुकती रही शूटिंग

के. आसिफ सिर्फ एक ऐतिहासिक फिल्म नहीं बनाना चाहते थे, बल्कि पर्दे पर मुगल दौर को जीवंत करना चाहते थे। यही वजह थी कि वह छोटी से छोटी चीज पर भी समझौता करने को तैयार नहीं थे।

फिल्म की शूटिंग से जुड़ा एक चर्चित किस्सा है कि एक दृश्य में मधुबाला को पानी के कुंड के पास खड़ा होना था। बताया जाता है कि के. आसिफ चाहते थे कि कुंड में साधारण पानी की जगह इत्र डाला जाए, ताकि दृश्य में खुशबू और माहौल का खास एहसास पैदा हो सके। इसके इंतजाम में शूटिंग कई दिनों तक रुकी रही।

असली मोती का इस्तेमाल करना चाहते थे डायरेक्टर

एक अन्य किस्से के मुताबिक, सलीम के युद्ध से लौटने वाले दृश्य में के. आसिफ असली मोतियों का इस्तेमाल करना चाहते थे। मोतियों का इंतजाम होने तक शूटिंग टाल दी गई।

जयपुर में युद्ध के एक दृश्य की शूटिंग के दौरान बैकग्राउंड में बिजली के खंभे दिखाई देने की बात भी कही जाती है। मुगलकाल की कहानी में आधुनिक बिजली के खंभे के. आसिफ को मंजूर नहीं थे। बताया जाता है कि उन्होंने कैमरे का एंगल बदलने के बजाय खंभे हटवाने की कोशिश की। ये किस्से बताते हैं कि फिल्म की ऐतिहासिक दुनिया को विश्वसनीय बनाने के लिए डायरेक्टर किस हद तक जाने को तैयार थे।

शीश महल का सेट देखकर हर कोई रह गया हैरान

‘मुगल-ए-आजम’ का सबसे यादगार हिस्सा शीश महल में फिल्माया गया गाना ‘प्यार किया तो डरना क्या’ है। इस दृश्य के लिए बेहद भव्य सेट तैयार किया गया था, जिसमें हजारों शीशों का इस्तेमाल हुआ। इसकी चमक और भव्यता ने इसे हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार दृश्यों में शामिल कर दिया।

हालांकि, इतने शीशों के बीच शूटिंग करना आसान नहीं था। कैमरे, लाइट और फिल्म यूनिट का प्रतिबिंब शीशों में दिखाई देने का खतरा था। सिनेमैटोग्राफर आर.डी. माथुर और उनकी टीम ने तकनीकी चुनौतियों से निपटने के लिए खास इंतजाम किए। इस सेट पर उस समय करीब 15 लाख रुपये खर्च होने की बात कही जाती है। उस दौर में यह अपने आप में बहुत बड़ी रकम थी।

बजट बढ़ा तो पूरी फिल्म रंगीन बनाने का सपना रह गया अधूरा

‘मुगल-ए-आजम’ अपने समय की सबसे महंगी भारतीय फिल्मों में शामिल थी। इसका बजट करीब 1.5 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। उस दौर में जब कई फिल्में कुछ लाख रुपये में बन जाती थीं, तब इतनी बड़ी रकम खर्च करना अपने आप में जोखिम भरा फैसला था।

फिल्म को पूरी तरह रंगीन बनाने की योजना थी, लेकिन बढ़ते खर्च और लंबे निर्माण के कारण यह संभव नहीं हो पाया। इसलिए फिल्म का ज्यादातर हिस्सा ब्लैक एंड व्हाइट में शूट किया गया। हालांकि, कुछ खास दृश्यों को टेक्नीकलर में फिल्माया गया, जिनमें ‘प्यार किया तो डरना क्या’ का शीश महल वाला दृश्य सबसे यादगार रहा।

बाद में 2004 में फिल्म का पूरी तरह रंगीन संस्करण भी सिनेमाघरों में रिलीज किया गया। इससे नई पीढ़ी के दर्शकों को इस क्लासिक फिल्म को रंगीन रूप में देखने का मौका मिला।

रिलीज होते ही रच दिया इतिहास, आज भी याद किया जाता है नाम

आखिरकार 5 अगस्त 1960 को ‘मुगल-ए-आजम’ सिनेमाघरों में रिलीज हुई। फिल्म में पृथ्वीराज कपूर ने अकबर, दिलीप कुमार ने सलीम और मधुबाला ने अनारकली का किरदार निभाया। इसके संवाद, संगीत, भव्य सेट और कलाकारों के अभिनय ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी।

फिल्म ने अपने समय में बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रोटेस्ट किया और भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलताओं में शामिल हुई। इसकी कमाई का रिकॉर्ड लंबे समय तक कायम रहा, जिसे 1975 में रिलीज हुई ‘शोले’ ने पीछे छोड़ा।

एक फिल्म में लगाए जिंदगी के 15 साल

दिलचस्प बात यह है कि के. आसिफ ने इस फिल्म के निर्माण में अपनी जिंदगी के करीब 15 साल लगा दिए। हालांकि, उनकी अगली फिल्म ‘लव एंड गॉड’ उनके जीवनकाल में पूरी नहीं हो सकी। साल 1971 में 48 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। यह फिल्म बाद में 1986 में रिलीज हुई।

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