
मनोरंजन डेस्क। वेटरन एक्टर नाना पाटेकर का गुरुवार, 8 अक्टूबर को गोवा में हार्ट अटैक से निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार उसी रात पुणे के पास स्थित उनके फार्महाउस ‘नानाची वाडी’ में किया गया। रात करीब 11:30 बजे पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार हुआ। आमतौर पर अंतिम संस्कार दिन में किया जाता है, ऐसे में नाना पाटेकर का अंतिम संस्कार इतनी देर रात क्यों हुआ? उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने इसकी वजह बताई है।
साथ ही, हिंदू धर्म में रात के समय दाह संस्कार करने को लेकर क्या मान्यताएं हैं, यह भी जानना जरूरी है।
नाना पाटेकर के बेटे मल्हार पाटेकर ने बताया कि परिवार को उम्मीद थी कि उनके पिता का पार्थिव शरीर गोवा से जल्द पुणे स्थित पैतृक फार्महाउस पहुंच जाएगा। हालांकि, परिवहन में देरी होने के कारण पार्थिव शरीर को गांव तक लाने में उम्मीद से ज्यादा समय लग गया।
मल्हार के मुताबिक, नाना पाटेकर का निधन गुरुवार तड़के हुआ था। इस दुखद घटना के बाद पहले ही कई घंटे बीत चुके थे। ऐसे में परिवार ने फैसला किया कि अंतिम संस्कार उसी दिन पूरा कर दिया जाए।
मीडिया से बातचीत में मल्हार ने कहा- हम गोवा में थे और उनके पार्थिव शरीर को गांव स्थित फार्महाउस लाया जाना था। हमें उम्मीद थी कि वह पहले पहुंच जाएगा, लेकिन इसमें कुछ समय लग गया। चूंकि यह दुखद घटना सुबह जल्दी हुई थी और काफी समय बीत चुका था। इसलिए हमने उसी दिन अंतिम संस्कार करने का फैसला किया।
हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार को जीवन की महत्वपूर्ण धार्मिक प्रक्रियाओं में से एक माना जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, आमतौर पर दाह संस्कार दिन के समय करना उचित माना जाता है। कई समुदायों में सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करने से बचने की परंपरा है।
कुछ धार्मिक मान्यताओं में रात के समय को अंतिम संस्कार के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। इसी वजह से परिवार अक्सर कोशिश करते हैं कि सूर्यास्त से पहले ही दाह संस्कार की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। हालांकि, इसे सभी हिंदुओं पर लागू होने वाला एक समान और अनिवार्य नियम नहीं कहा जा सकता।
धर्म के नजरिए से रात में अंतिम संस्कार करना पूरी तरह वर्जित है या नहीं, इसका जवाब परंपरा और मान्यता पर निर्भर करता है। हिंदू धर्म में अलग-अलग क्षेत्रों, समुदायों और परिवारों की धार्मिक परंपराएं अलग हो सकती हैं। अंतिम संस्कार का समय तय करते समय स्थानीय रीति-रिवाजों के साथ-साथ परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाता है।
नाना पाटेकर के मामले में भी पार्थिव शरीर को गोवा से पुणे लाने में हुई देरी के कारण अंतिम संस्कार रात में किया गया। उनके बेटे ने स्पष्ट किया कि परिवार ने उसी दिन अंतिम विदाई देने का फैसला किया था।
अगले जन्म में शारीरिक दोष की मान्यता: गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि रात के समय किसी का अंतिम संस्कार किया जाता है, तो मृत आत्मा को परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि रात में दाह संस्कार करने से जीवात्मा को अगले जन्म में किसी न किसी प्रकार की शारीरिक कमी या दोष का सामना करना पड़ सकता है।
सूर्य का महत्व और मोक्ष का मार्ग: हिंदू धर्म में सूर्य को आत्मा का कारक, ऊर्जा और चेतना का प्रतीक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, आत्मा सूर्य से ही उत्पन्न होती है और अंत में उसी में विलीन हो जाती है। इसलिए दिन के समय सूर्य की मौजूदगी में अंतिम संस्कार करना आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है।
स्वर्ग के द्वार और नकारात्मक शक्तियां: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्यास्त के बाद स्वर्ग के द्वार बंद हो जाते हैं और रात में नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ जाता है। ऐसे समय में दाह संस्कार करने से आत्मा के मोक्ष मार्ग में बाधाएं उत्पन्न होने की आशंका रहती है।
मल्हार पाटेकर ने अपने पिता के निधन के बाद उनकी सामाजिक विरासत और समाज के लिए किए गए कामों को भी याद किया। उन्होंने कहा कि नाना साहेब जैसे लोग अपने काम के जरिए हमेशा लोगों के बीच जीवित रहते हैं।
मल्हार ने कहा- नाना साहेब जैसे इंसान कभी सच में दुनिया से विदा नहीं होते। अपने काम के जरिए वे अमर हो जाते हैं। उनकी सोच हमेशा एक जैसी रही। वह अक्सर कहते थे कि इंसानियत के नाम पर एक साथ आएं और दुनिया को बेहतर बनाने के लिए काम करें।
उन्होंने आगे बताया कि उनके पिता की संस्था के जरिए पानी के क्षेत्र में काम चल रहा था। इसके अलावा, कश्मीर में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े स्तर पर काम शुरू किया गया था। मल्हार के मुताबिक, नाना पाटेकर अपने जाने से पहले सभी लोगों को उनकी जिम्मेदारियां सौंप गए थे।
उनके इस बयान से साफ है कि नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ एक अभिनेता के तौर पर नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यों और जरूरतमंदों की मदद के लिए समर्पित व्यक्ति के रूप में भी रही है।