
मनोरंजन डेस्क। बॉलीवुड के कुछ गाने सिर्फ अपनी धुन और बोल की वजह से यादगार नहीं बनते, बल्कि उनके पीछे की कहानियां भी उन्हें खास बना देती हैं। फिल्म ‘पड़ोसन’ (1968) का गाना ‘एक चतुर नार करके सिंगार’ भी ऐसा ही है। किशोर कुमार और मन्ना डे की आवाज में सजे इस गाने को आज भी सुनकर लोग हंस पड़ते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान मन्ना डे थोड़े नाराज हो गए थे? वजह थी इसकी कहानी, जिसमें शास्त्रीय संगीत का जानकार किरदार आखिर में हार जाता है और बिना शास्त्रीय प्रशिक्षण वाला किरदार जीत जाता है।
यह सिर्फ दो गायकों के बीच मुकाबला नहीं था। इसके पीछे संगीत की समझ, कलाकारों की अपनी शैली और किशोर कुमार की जबरदस्त इम्प्रोवाइजेशन यानी मौके पर कुछ नया जोड़ देने की प्रतिभा भी थी।
फिल्म ‘पड़ोसन’ में यह गाना एक संगीत मुकाबले के रूप में दिखाया गया है। पर्दे पर किशोर कुमार, सुनील दत्त के किरदार भोला के लिए आवाज देते हैं, जबकि मन्ना डे महमूद के किरदार मास्टर पिल्लई की आवाज बनते हैं।
कहानी में मास्टर पिल्लई शास्त्रीय संगीत के जानकार हैं और भोला को संगीत की ज्यादा समझ नहीं है। दोनों के बीच मुकाबला होता है, लेकिन अंत में भोला बाजी मार लेता है।
मन्ना डे को इसी बात पर आपत्ति थी। वह शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित गायक थे और उन्हें लगता था कि इस तरह की कहानी से गलत संदेश जा सकता है कि संगीत की विधिवत शिक्षा लेने वाला कलाकार हार जाता है, जबकि बिना प्रशिक्षण वाला व्यक्ति जीत जाता है।
सिंगर शान ने मई 2026 में ‘इंडियन आइडल’ के एक एपिसोड में यह किस्सा साझा किया था। उनके मुताबिक, मन्ना डे ने यह बात आरडी बर्मन और महमूद के सामने भी रखी थी। हालांकि, बाद में उन्होंने कहानी की मांग समझते हुए गाना गाने के लिए हामी भर दी।
इस गाने की सबसे खास बात किशोर कुमार का अंदाज था। रिहर्सल के दौरान वह लगातार अपनी तरफ से कुछ नया जोड़ रहे थे। संगीतकार आरडी बर्मन यानी पंचम दा को किशोर की यह सहज मस्ती पसंद आ रही थी।
संगीत पर रिसर्च करने वाले अनिरुद्ध भट्टाचार्जी के मुताबिक, रिहर्सल के दौरान किशोर कुमार ने ‘ओ टेढ़े, सीधे हो जा रे’ जैसी लाइन अपने अंदाज में जोड़ दी थी। मन्ना डे इस बदलाव से चौंक गए, लेकिन आरडी बर्मन ने उन्हें गाना जारी रखने का संकेत दिया। उन्हें लगा कि किशोर की यही स्वाभाविक शरारत गाने को और मजेदार बना रही है।
बाद में मन्ना डे ने भी किशोर कुमार की प्रतिभा की तारीफ की। उन्होंने माना कि किशोर ने जिस सहजता से गाने में हास्य और संगीत का तालमेल बैठाया, वह काबिल-ए-तारीफ था।
इस गाने की तैयारी भी काफी दिलचस्प थी। मन्ना डे ने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था कि इसकी रिहर्सल पांच-छह दिनों तक चली थी। हर बैठक कई घंटों की होती थी। रिकॉर्डिंग वाले दिन सुबह करीब नौ बजे काम शुरू हुआ और रात नौ बजे तक चला।
उन्होंने यह भी याद किया था कि स्टूडियो के कर्मचारी, जो आमतौर पर शाम तक घर चले जाते थे, उस दिन रिकॉर्डिंग सुनने के लिए रुके रहे। गाने के दौरान स्टूडियो में हंसी और मस्ती का माहौल बना हुआ था।
इस गाने की एक और दिलचस्प बात है। यह पूरी तरह नई धुन नहीं थी। इसकी मूल धुन का संबंध अशोक कुमार की 1941 में आई फिल्म ‘झूला’ के एक गाने से था। आरडी बर्मन ने पुराने संगीत को नए अंदाज और नाटकीय प्रस्तुति के साथ पेश किया।
‘एक चतुर नार’ की खासियत यही है कि इसमें मुकाबला सिर्फ किरदारों के बीच नहीं, बल्कि दो बिल्कुल अलग गायकी के अंदाज के बीच भी दिखाई देता है। मन्ना डे की शास्त्रीय पकड़ और किशोर कुमार की सहज, शरारती गायकी ने मिलकर ऐसा गाना बनाया, जिसे करीब छह दशक बाद भी लोग उतने ही मजे से सुनते हैं।
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