
एंटरटेनमेंट डेस्क: भारत की आजादी के बाद सामाजिक और कानूनी बदलावों का असर सिर्फ आम नागरिकों पर ही नहीं, बल्कि तवायफ समुदाय पर भी पड़ा। उनके पेशे पर पाबंदी लगा दी गई, जिससे कई कलाकारों को अपनी आजीविका के नए रास्ते तलाशने पड़े। इसी दौर में कई तवायफों ने ऑल इंडिया रेडियो (AIR) का रुख किया, लेकिन यह राह भी आसान नहीं थी।
AIR ने तवायफ पृष्ठभूमि से आने वाली कलाकारों के सामने एक शर्त रखी उन्हें अपनी शादी का प्रमाण पत्र दिखाना होगा। यानी रेडियो पर गाने के लिए विवाह आवश्यक था। इसी शर्त को स्वीकार करते हुए बनारस घराने की प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका रसूलन बाई ने 1948 में तवायफ का पेशा छोड़ दिया और वाराणसी के एक व्यापारी से विवाह किया।

रसूलन बाई (1902–1974) बनारस घराने की एक चर्चित हिंदुस्तानी क्लासिकल सिंगर थीं। वह ठुमरी, दादरा और कजरी गायकी के लिए विशेष रूप से जानी जाती थीं। गरीबी और तवायफ परंपरा से निकलकर उन्होंने संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका जीवन आज़ादी के बाद कलाकारों की बदलती सामाजिक स्थिति का जीवंत उदाहरण है।
वेब सीरीज हीरामंडी में शामिल गीत ‘फूल गेंदवा ना मारो, लागत करेजवा में चोट’ को रसूलन बाई ने 1935 में गाया था। यह पारंपरिक गीत बनारस घराने की शैली में प्रस्तुत किया गया था। बाद के वर्षों में इसे मन्ना डे सहित अन्य कलाकारों ने भी दोहराया। यह गीत आज भी शास्त्रीय संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है।
रसूलन बाई को 1957 में संगीत नाटक अकादमी ने हिंदुस्तानी संगीत गायन के लिए सम्मानित किया। इसके बावजूद उनका जीवन आर्थिक संघर्षों से भरा रहा। वह उसी रेडियो स्टेशन के पास एक छोटी सी चाय की दुकान चलाती थीं, जहां से कभी उनकी आवाज़ प्रसारित होती थी।
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1969 के सांप्रदायिक दंगों में उनका घर जला दिया गया था। 15 दिसंबर 1974 को 72 वर्ष की उम्र में रसूलन बाई का निधन गरीबी में हुआ। उनकी और अन्य महिला संगीतकारों की तवायफ परंपरा को सबा दीवान की फिल्म द अदर सॉन्ग (2009) में भी दर्शाया गया है।