
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली. कुमार, एक ऐसे एक्टर जिनके परिवार का कोई भी सदस्य 50 साल से ज्यादा जिंदा नहीं रहता था। शोले से फिल्मी दुनिया में पहचान बनाने वाले संजीव की मौत महज 47 की उम्र में हो गई। लोगों का मानना था कि ये कोई श्राप है जो उनके परिवार पर लगा है।
'शोले' फिल्म में ठाकुर बलदेव सिंह के रोल के बाद संजीव कुमार ने भारतीय सिनेमा में अपनी गहरी छाप छोड़ी। फिल्म में वह एक ऐसे रिटायर्ड पुलिस ऑफिसर बने थे जिसके दोनों हाथ डाकू गब्बर सिंह ने काट दिए थे। साथ ही पूरा परिवार मौत के घाट उतार दिया गया था। ठाकुर बलदेव सिंह के रोल को ऑडियंस आज भी काफी पसंद करती है।
संजीव कुमार की मौत 6 नवंबर 1985 में हार्ट अटैक के कारण हुई। इस वक्त वो सिर्फ 47 साल के थे। रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने अपनी मौत का अंदाजा पहले ही लगा लिया था। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि एक नामी एस्ट्रोलॉजर के अनुसार वो ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह सकते।
इसके साथ उनके परिवार के सभी लोगों की मौत 50 साल के पहले ही हो चुकी थी। उनका कहना था कि मेरे परिवार के सभी मर्दों की तरह मैं भी जल्दी ही मरने वाला हूं। यह प्रीडिक्शन उन्होंने गंभीरता से ली। शायद इसी डर ने उन्हें उम्रदार किरदारों की ओर मोड़ दिया। संजीव कुमार की मृत्यु 6 नवंबर 1985 को हार्ट अटैक से हुई। उस वक्त उनकी उम्र महज 47 साल थी।
संजीव कुमार के परिवार का इतिहास कुछ ऐसा था जिसने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया था कि वे ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहेंगे। उनके दादा शिवलाल जरीवाला, पिता जेठालाल जरीवाला, भाई किशोर जरीवाला और छोटे भाई निकुल, सभी 50 साल की उम्र से पहले इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। यही वजह थी कि संजीव को अपनी मौत का आभास हो गया था।
एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि वे इतनी कम उम्र में भी 'बूढ़े' किरदार क्यों निभाते हैं। तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, “मैं 50 के बाद जिंदा नहीं रहूंगा, तो बुढ़ापा पर्दे पर ही जी लूं।” उस वक्त उनकी यह बात सुनने में मजाक लगी, लेकिन यह सच साबित हुई।
संजीव कुमार ने अपनी उम्र से ज्यादा के कई किरदार निभाए। निभाने के साथ उन्होंने इसे रियल से भी ज्यादा अच्छा दिखाया। फेमस राइटर और प्रोड्यूसर गुलजार की फिल्मों में यह बात साफ देखी जा सकती है। 'परिचय' (1972), 'कोशिश' (1972), 'आंधी' (1975) और 'मौसम' (1975)- इन सभी फिल्मों में संजीव कुमार ने ऐसे किरदारों को बखूबी निभाया जो बहुत मुश्किल थे।
ये सभी किरदार स्क्रीन पर काफी रियल थे। लोगों को यकीन नहीं होता था कि यह 'बूढ़ा' दिखने वाला इंसान असल में तो महज तीस-पैंतीस साल का है।
फिल्म 'अंगूर' में संजीव कुमार ने डबल रोल निभाया, जो शेक्सपियर की 'The Comedy of Errors' पर आधारित थी। यह फिल्म हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन कॉमेडी फिल्मों में गिनी जाती है। इसमें भी संजीव की टाइमिंग और अंदाज कमाल के थे।
1978 में डायरेक्टर सत्यजीत रे की फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' में संजीव कुमार ने अमजद खान और सईद जाफरी जैसे एक्टर्स के साथ काम किया। फिल्म में वे एक ऐसे नवाब बने थे जिन्हें चेस खेलना बहुत पसंद था। वो अंग्रेजों और देश के बदलते सियासी माहौल से बेखबर सिर्फ शतरंज की चालों में उलझा रहता है।
संजीव कुमार की जीवनी An Actor’s Actor: The Authorised Biography of Sanjeev Kumar के राइटर हनीफ जावेरी ने इस बात को कंफर्म किया है की संजीव को अपनी मौत का पहले से ही आभास था। वो इससे डरते नहीं थे। जावेरी ने बताया कि संजीव के दादा, पिता और दोनों भाइयों की मौत भी 50 की उम्र से पहले हो चुकी थी, और संजीव को यह एहसास था कि उनका अंत भी कुछ ऐसा ही हो सकता है।
संजीव कुमार का जीवन भले ही छोटा रहा। लेकिन उनके द्वारा निभाए गए किरदार उन्हें भारतीय सिनेमा में एक अलग पहचान दिलाती है।
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