
मनोरंजन डेस्क। बॉलीवुड की क्लासिक फिल्मों की बात हो और Sholay का नाम न आए, ऐसा मुश्किल है। साल 1975 में रिलीज हुई इस फिल्म के डायलॉग, किरदार और कई सीन आज भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय हैं। जय-वीरू की दोस्ती से लेकर गब्बर सिंह के अंदाज तक, फिल्म के कई हिस्से हिंदी सिनेमा की पहचान बन चुके हैं। लेकिन इस फिल्म की खासियत सिर्फ इसकी कहानी और किरदार नहीं, बल्कि इससे जुड़े मेकिंग के किस्से भी हैं।
इन्हीं में एक दिलचस्प किस्सा अमिताभ बच्चन और जया बच्चन के उस सीन से जुड़ा है, जिसमें जय माउथ ऑर्गन बजाता है और राधा घर के गलियारे में जलते दीये बुझाती है। इस दृश्य को खास बनाने के लिए डायरेक्टर रमेश सिप्पी सही रोशनी चाहते थे। बताया जाता है कि इसके लिए टीम को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। हालांकि, इस किस्से में तीन साल के इंतजार की अवधि को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि इसका मतलब लगातार तीन साल तक उसी सीन की शूटिंग करना नहीं है।
Sholay में अमिताभ बच्चन ने जय और जया बच्चन ने राधा का किरदार निभाया था। दोनों के बीच फिल्म में बहुत ज्यादा संवाद नहीं हैं, लेकिन उनके रिश्ते को कुछ खामोश दृश्यों के जरिए भी दिखाया गया है। दीये बुझाने और माउथ ऑर्गन बजाने वाला दृश्य इसी तरह के यादगार पलों में शामिल है।
इस सीन में राधा घर के गलियारे में एक-एक करके दीये बुझाती है, जबकि जय बाहर बैठकर माउथ ऑर्गन बजाता है। दोनों के बीच बातचीत नहीं होती, फिर भी दृश्य उनके बीच के भावनात्मक जुड़ाव की झलक देता है।
इस दृश्य की खूबी यह है कि इसमें भावनाएं शब्दों से नहीं, बल्कि रोशनी, संगीत, चेहरे के भाव और माहौल से सामने आती हैं। दर्शक जय और राधा के रिश्ते को समझने के लिए किसी लंबे संवाद के मोहताज नहीं होते।
इस किस्से के मुताबिक, डायरेक्टर रमेश सिप्पी और सिनेमैटोग्राफर द्वारका दिवेचा इस दृश्य के लिए सूर्यास्त के समय मिलने वाली खास रोशनी चाहते थे। टीम को ऐसा दृश्य फिल्माना था, जिसमें बाहर की प्राकृतिक रोशनी और घर के भीतर जलते दीयों का प्रकाश एक खास माहौल तैयार करे।
सूर्यास्त के समय रोशनी तेजी से बदलती है। कुछ ही मिनटों में आसमान का रंग, उजाले की तीव्रता और परछाइयों का आकार बदल सकता है। ऐसे में डायरेक्टर जिस तरह का फ्रेम चाहते थे, उसे हासिल करने के लिए सही समय और परिस्थितियों का मिलना जरूरी था।
किस्से के अनुसार, जब तक मनचाही रोशनी नहीं मिलती, तब तक दृश्य को फिल्माने से बचा गया। हालांकि, तीन साल तक इंतजार किए जाने की अवधि को लेकर उपलब्ध विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। इसलिए इसे पूरी तरह प्रमाणित तथ्य के बजाय फिल्म की मेकिंग से जुड़ा प्रचलित किस्सा समझना बेहतर होगा।
फिल्मों में सिनेमैटोग्राफी का काम सिर्फ कलाकारों को कैमरे में रिकॉर्ड करना नहीं है। रोशनी, कैमरे का कोण, रंग और परछाइयां किसी दृश्य के भावनात्मक असर को बदल सकते हैं। एक ही कलाकार को तेज रोशनी में दिखाने और हल्की, धुंधली रोशनी में दिखाने से दर्शकों को अलग-अलग एहसास हो सकते हैं।
जय और राधा के इस दृश्य में भी रोशनी कहानी का हिस्सा बन जाती है। दीयों की लौ, सूर्यास्त का माहौल और माउथ ऑर्गन की धुन मिलकर ऐसा दृश्य तैयार करते हैं, जिसमें किरदारों की भावनाएं बिना ज्यादा संवाद के सामने आती हैं।
यही वजह है कि फिल्म निर्माण में कई बार डायरेक्टर किसी छोटे-से दृश्य पर भी काफी समय देते हैं। हर शॉट को सिर्फ जल्दी पूरा करना जरूरी नहीं होता; कई बार सही माहौल और दृश्य का असर ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
1975 में रिलीज हुई ‘शोले’ कल्ट क्लासिक फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म को सलीम जावेद ने लिखा है। वहीं, इसमें लीड रोल में अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया बच्चन, संजीव कुमार और अमजद खान थे। इस फिल्म को 2 3 करोड़ के बजट में बनाया गया था। वहीं, फिल्म ने 16 करोड़ का कलेक्शन किया था। हाल ही में शोले को 50 साल पूरे हो चुके हैं।