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मनोरंजन डेस्क। बॉलीवुड की चमकती दुनिया पर्दे पर जितनी रंगीन नजर आती है, उसके इतिहास के कुछ पन्ने उतने ही डरावने हैं। एक दौर ऐसा भी था, जब फिल्में बनाने वाले प्रोड्यूसर्स, म्यूजिक इंडस्ट्री और बड़े सेलेब्स कथित तौर पर अंडरवर्ल्ड की धमकियों के साये में काम करते थे। कहीं पैसों की मांग होती थी, तो कहीं फिल्म के कारोबार और विदेशी डिस्ट्रीब्यूटर्स को लेकर दबाव बनाने के आरोप सामने आते थे।
18 अक्टूबर 2026 को मुंबई के जुहू इलाके में एक्टर टाइगर श्रॉफ से जुड़ी फायरिंग की घटना के बाद यह इतिहास फिर चर्चा में है। पुलिस मामले की जांच कर रही है। 22 अक्टूबर तक सामने आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मामले में कई संदिग्धों को गिरफ्तार किया जा चुका है। जांच एजेंसियां हमले के मकसद, आरोपियों के आपसी संपर्क और कथित आपराधिक नेटवर्क की भूमिका की पड़ताल कर रही हैं। हालांकि, किसी गिरोह से संबंध होने के दावों को जांच और अदालत में सामने आने वाले सबूतों के आधार पर ही अंतिम रूप से स्थापित किया जा सकता है।
यह घटना अपने आप में एक सवाल खड़ा करती है- क्या बॉलीवुड पर अपराध जगत का दबाव पहले भी इसी तरह सामने आता रहा है? इसका जवाब तलाशने के लिए 1990 के दशक के उन मामलों को समझना होगा, जिन्होंने फिल्म इंडस्ट्री की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी थी।
मुंबई के अंडरवर्ल्ड और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बीच संपर्क की चर्चा कई दशकों पुरानी है। शुरुआती दौर में कुछ अपराध जगत से जुड़े लोगों के फिल्मी हस्तियों के साथ मेलजोल और फिल्म कारोबार में पैसे लगाने की खबरें सामने आती थीं। लेकिन 1980 के दशक के आखिरी वर्षों और 1990 के दशक में कई मामलों में कथित वसूली, धमकियों और फिल्म प्रोड्यूसर्सओं पर दबाव डालने की शिकायतें सामने आईं।
फिल्मों की फाइनेंसिंग, विदेशी वितरण अधिकार और कलाकारों की कास्टिंग जैसे मुद्दे भी इस चर्चा का हिस्सा बने। कुछ फिल्म प्रोड्यूसर्सओं ने बाद में अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उस दौर में धमकियों के कारण उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता रहती थी।
इसी दौर की कुछ घटनाएं ऐसी थीं, जिन्होंने पूरे फिल्म जगत को हिला दिया-
12 अगस्त 1997 को टी-सीरीज के संस्थापक गुलशन कुमार की मुंबई के जुहू इलाके में एक मंदिर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई। संगीत कारोबार में तेजी से आगे बढ़े गुलशन कुमार की हत्या ने फिल्म और संगीत जगत की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
इस मामले की जांच के दौरान आपराधिक गिरोहों से जुड़े लोगों के नाम सामने आए। अब्दुल रऊफ मर्चेंट को हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया और 2002 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई। 2021 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी।
गुलशन कुमार की हत्या केवल एक बड़े कारोबारी की हत्या नहीं थी। इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे फिल्म और संगीत कारोबार को अपराधी अपने दबाव में लाने की कोशिश कर रहे थे।
21 जनवरी 2000 को डायरेक्टर और प्रोड्यूसर्स राकेश रोशन पर मुंबई में उनके कार्यालय के पास गोलीबारी हुई। वह इस हमले में बच गए, लेकिन घटना ने फिल्म इंडस्ट्री में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी।
राकेश रोशन की फिल्म कहो ना… प्यार है उस समय बड़ी सफलता हासिल कर चुकी थी। बाद में इस हमले को फिल्म के कारोबार और कथित वसूली की मांगों से जोड़कर देखा गया। हालांकि, हमले के पीछे के कारणों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं, इसलिए उन्हें स्थापित तथ्य की तरह पेश करना उचित नहीं होगा।
इस घटना ने यह भी दिखाया कि फिल्म इंडस्ट्री के बड़े नाम भी आपराधिक धमकियों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं थे।
1990 के दशक में फिल्म प्रोड्यूसर्स जावेद रियाज सिद्दीकी और मुकेश दुग्गल की हत्या के मामले भी चर्चा में रहे। डायरेक्टर राजीव राय पर भी हमला हुआ था, जिसमें वह बच गए।
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि उस दौर में खतरा केवल पर्दे पर दिखाई देने वाले कलाकारों तक सीमित नहीं था। फिल्म बनाने, कारोबार चलाने और वितरण से जुड़े लोग भी हिंसा की घटनाओं से प्रभावित हुए थे।
टाइगर श्रॉफ से जुड़े फायरिंग मामले में पुलिस की जांच के दौरान कई गिरफ्तारियां हुई हैं। 22 अक्टूबर की रिपोर्टों के मुताबिक, मामले में तीन आरोपियों को 31 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में भेजा गया था। इसके अलावा दिल्ली और हरियाणा से भी संदिग्धों को गिरफ्तार किए जाने की खबरें सामने आईं। पुलिस कथित हथियारों की बरामदगी और घटना के पीछे के मकसद की जांच कर रही है।
इस मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि हमला क्यों किया गया और क्या इसका संबंध किसी संगठित आपराधिक नेटवर्क से है? पुलिस की जांच पूरी होने से पहले इन सवालों पर किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
इस घटना के बाद बॉलीवुड के दूसरे सेलेब्स की सुरक्षा को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। लेकिन किसी एक्टर को मिली धमकी और किसी आपराधिक गिरोह के साथ उसके संबंध के दावे अलग-अलग बातें हैं। इनका आकलन पुलिस के आधिकारिक बयानों और जांच में सामने आए सबूतों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
पहले और आज के मामलों में एक समानता यह है कि दोनों दौर में फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं। लेकिन अपराधियों के तरीके, जांच की तकनीक और फिल्म कारोबार की संरचना में बदलाव आया है।
90 के दशक में फोन पर धमकियों, कथित वसूली और कारोबार पर दबाव डालने की शिकायतें प्रमुखता से सामने आती थीं। आज किसी मामले की जांच में डिजिटल संदेश, फोन रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, वित्तीय लेन-देन और ऑनलाइन किए गए दावों की भूमिका भी अहम हो सकती है।
हालांकि, तकनीक बदलने का अर्थ यह नहीं कि हर नई घटना पुराने दौर की ही पुनरावृत्ति है। हर मामले के पीछे का मकसद और अपराधियों का नेटवर्क अलग हो सकता है।
बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल फिल्मी सेलेब्स की सुरक्षा का मामला नहीं है। यह फिल्म कारोबार की स्वतंत्रता, कलाकारों की सुरक्षा और संगठित अपराध के प्रभाव को समझने का विषय भी है।