
पूजा गीते, नईदुनिया, इंदौर। पर्दे पर अपनी दमदार आवाज और तीखे अभिनय से पहचान बनाने वाले नाना पाटेकर को इंदौर ने एक अलग रूप में भी देखा था- निशानेबाज नाना के रूप में। वर्ष 2004 में इंदौर की बीएसएफ रेवती रेंज में हुई 48वीं राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप में उन्होंने 300 मीटर बिग-बोर स्पर्धा में रजत पदक जीता था।
यही वह इंदौर था, जहां कैमरे के सामने अभिनय करने वाला कलाकार शूटिंग रेंज में राइफल थामकर लक्ष्य साध रहा था। गुरुवार को 75 वर्ष की उम्र में नाना पाटेकर के निधन की खबर के साथ इंदौर से जुड़ी उनकी ये यादें भी फिर ताजा हो गईं।
नाना का निशानेबाजी से रिश्ता फिल्म ‘प्रहार’ के दौरान मिले सैन्य प्रशिक्षण से बना था। बाद में करीब 49 वर्ष की उम्र में उन्होंने इसे प्रतियोगी खेल के रूप में गंभीरता से अपनाया। वे 50 मीटर राइफल प्रोन और 300 मीटर बिग-बोर स्पर्धाओं में हिस्सा लेते थे और महू सहित विभिन्न शूटिंग रेंज में अभ्यास करते थे।
इंदौर के राइफल शूटर डा. राजेश जौहरी बताते हैं कि 2007 में महू में नाना करीब 10 दिन आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट में रुके थे। जौहरी की उनसे वहीं दोस्ती हुई। उनके अनुसार नाना को निशानेबाजी का प्रशिक्षण डीएससी के इंस्पेक्टर भीम सिंह रावत और आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट के सूबेदार मेजर सलीम ने दिया था।
डा. जौहरी के अनुसार, एक दिन नाना के साथ फोटो खिंचवाने के लिए करीब 200 लोग पहुंच गए। सभी के जाने के बाद नाना ने कर्नल दिनेश से मजाक में कहा- देखना मेरा वजन कम तो नहीं हो गया, इतने फोटो खिंच गए हैं आज? उनके इस अंदाज पर वहां मौजूद सभी लोग हंस पड़े। जौहरी बताते हैं कि नाना बिल्कुल बेबाक और सहज थे। जरूरतमंद को परेशान देखते तो अपनी जेब में जितने पैसे होते, मदद कर देते थे।
आनरेरी कैप्टन राजेंद्र सिंह थापा बताते हैं कि 2015 में महू में आयोजित राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप के दौरान उन्हें नाना को कोचिंग देने का अवसर मिला। उनके अनुसार शूटिंग रेंज पर नाना को किसी बड़े फिल्म कलाकार की तरह नहीं, बल्कि सीखने वाले खिलाड़ी की तरह देखा जाता था। निशानेबाजी को लेकर उनकी लगन ही उन्हें दूसरे कलाकारों से अलग बनाती थी।
सामाजिक विचारक और रचनाकार देवेंद्र बंसल की नाना से मुलाकात भी इंदौर की स्मृतियों में अलग जगह रखती है। बंसल बताते हैं कि एक बार मुंबई के गेटवे आफ इंडिया पर हुई मुलाकात के बाद इंदौर एयरपोर्ट पर नाना फिर मिल गए। उन्हें लेने कोई नहीं आया था, इसलिए बंसल उन्हें अपने घर ले आए। वहां चाय-नाश्ते के साथ क्रिकेट देखा और नाना परिवार में ऐसे घुल-मिल गए जैसे वर्षों से परिचित हों। जाते समय उन्होंने बंसल की माता के चरण स्पर्श किए।
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