
एंटरटेनमेंट डेस्क। छोटे पर्दे पर जब दूरदर्शन का स्वर्ण युग था, तब एक मुस्कान ने पूरे देश को मंत्रमुग्ध कर दिया था। वह मुस्कान थी अरुण गोविल की। 12 जनवरी 1958 को उत्तर प्रदेश के मेरठ की मिट्टी में जन्मे अरुण गोविल ने अभिनय को केवल मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि एक 'तपस्या' बना दिया।
आज भी जब वह किसी सार्वजनिक स्थान पर जाते हैं, तो लोग सहज ही उनके चरणों में झुक जाते हैं। यह सम्मान किसी अभिनेता को नहीं, बल्कि उस सादगी और शुचिता को है जिसे गोविल ने अपने भीतर आत्मसात किया।

अरुण गोविल का 'भगवान श्रीराम' का किरदार केवल लाइटिंग, कैमरा और संवादों तक सीमित नहीं था। उन्होंने इस भूमिका के लिए अपने निजी जीवन के कई सुखों और आदतों का त्याग किया।
पर्दे पर प्रभु श्रीराम को जीवंत करने के पीछे उनकी सालों की वह साधना थी, जिसने उन्हें भीड़ से अलग कर दिया। यही कारण है कि दशकों बाद भी, चाहे देश हो या विदेश, उनकी छवि लोगों के जेहन में अमिट है।

रामानंद सागर की 'रामायण' में अरुण गोविल ने जिस ठहराव और मर्यादा के साथ राम के चरित्र को जिया, उसने लाखों लोगों की आस्था को सीधे छुआ। उनके सौम्य व्यक्तित्व ने उस दौर में घर-घर को मंदिर बना दिया था। आज के चकाचौंध भरे दौर में भी, गोविल के प्रति वही पुराना आदर बरकरार है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि सादगी की मिसाल माने जाने वाले गोविल कभी 'चेन स्मोकर' थे। उनके जीवन की यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।

अरुण गोविल के पिता चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ाई-लिखाई कर एक सुरक्षित सरकारी नौकरी करे। हालांकि, अरुण के मन में अभिनय का जुनून था। कॉलेज के दिनों में नाटकों में हिस्सा लेने वाले गोविल ने अंततः अपने सपनों को पंख देने के लिए मुंबई का रुख किया।
1977 में ताराचंद बड़जात्या की फिल्म 'पहेली' से उन्होंने बॉलीवुड में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने 'सावन को आने दो', 'हिम्मतवाला' और 'दिलवाला' जैसी कई बड़ी फिल्मों में काम किया। उन्होंने तत्कालीन सुपरस्टार श्रीदेवी के साथ भी स्क्रीन शेयर की थी।
.jpg)
अरुण गोविल ने रामानंद सागर के मशहूर शो 'विक्रम और बेताल' में राजा विक्रमादित्य का किरदार निभाया था। गोविल की सौम्य मुस्कान और शांत व्यक्तित्व से प्रभावित होकर रामानंद सागर ने उन्हें 'रामायण' के लिए चुना। 1988 में जब 'रामायण' का प्रसारण शुरू हुआ, तो गोविल रातों-रात वैश्विक स्टार बन गए।

द कपिल शर्मा शो में एक दिलचस्प किस्सा साझा करते हुए अरुण गोविल ने बताया कि वह कभी बहुत ज्यादा सिगरेट पिया करते थे। उन्होंने बताया, मैं एक साउथ की फिल्म की शूटिंग कर रहा था और सेट के कोने में बैठकर सिगरेट पी रहा था।
तभी एक शख्स मेरे पास आया और अपनी भाषा (तमिल) में मुझे बुरी तरह डांटने लगा। मुझे उसकी भाषा समझ नहीं आई, लेकिन उसके चेहरे पर गुस्सा साफ था।"
बाद में जब गोविल ने उस शख्स की बात का अनुवाद करवाया, तो उन्हें पता चला कि वह व्यक्ति कह रहा था, 'हम तो आपको भगवान मानते हैं और आप यह क्या कर रहे हैं?' इस घटना ने गोविल को झकझोर कर रख दिया और उन्होंने उसी पल तय किया कि वह कभी सिगरेट को हाथ नहीं लगाएंगे।

आज दशकों बाद भी अरुण गोविल की छवि लोगों के मन में 'भगवान राम' के रूप में ही बसी है। वे जहाँ भी जाते हैं, लोग आज भी उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। यह उनके अभिनय और उनके चरित्र की ही ताकत है कि एक कलाकार और उसके किरदार के बीच की रेखा हमेशा के लिए मिट गई।