
मनोरंजन डेस्क। बॉलीवुड की फिल्मों में सेलेब्स के कपड़ों से लेकर महलों जैसे भव्य सेट तक, हर चीज पर लाखों-करोड़ों खर्च किए जाते हैं। लेकिन जैसे ही शूटिंग खत्म होती है, इनका क्या होता है? क्या महंगे लहंगे अलमारी में बंद कर दिए जाते हैं या किसी दूसरी फिल्म में नजर आते हैं? क्या करोड़ों के सेट को तोड़कर फेंक दिया जाता है? पर्दे के पीछे की कहानी काफी दिलचस्प है।
जब हम कोई फिल्म देखते हैं, तो हीरो-हीरोइन के कपड़े, चमचमाते गहने और आलीशान घर हमारा ध्यान खींचते हैं। इन चीजों को तैयार करने में कॉस्ट्यूम डिजाइनर, प्रोडक्शन डिजाइनर और कई कारीगर मेहनत करते हैं। लेकिन शूटिंग खत्म होने के बाद हर चीज का भविष्य एक जैसा नहीं होता। कुछ सामान सुरक्षित रखा जाता है, कुछ किराये पर लिया होने के कारण वापस कर दिया जाता है और कई चीजों को दूसरी फिल्मों में इस्तेमाल किया जाता है।
फिल्म में कलाकारों के कपड़े उनके किरदार, कहानी और फिल्म के दौर को ध्यान में रखकर तैयार किए जाते हैं। किसी फिल्म में साधारण जींस-टीशर्ट की जरूरत होती है, तो किसी में भारी कढ़ाई वाले लहंगे और शाही पोशाकों की।
शूटिंग पूरी होने के बाद इन कपड़ों को इकट्ठा करके उनकी पहचान के साथ रखा जा सकता है। प्रोडक्शन हाउस के अपने कपड़े स्टोर में रखे जाते हैं, जबकि किराये पर लिए गए कपड़े संबंधित विक्रेता को लौटा दिए जाते हैं।
कई बार पुराने कपड़ों में बदलाव करके उन्हें दूसरी फिल्म में इस्तेमाल किया जाता है। किसी ड्रेस का ब्लाउज, दुपट्टा या दूसरी डिजाइन वाली चीज नए कॉस्ट्यूम का हिस्सा बन सकती है। हालांकि, हर पोशाक दोबारा इस्तेमाल के लायक नहीं होती।
हां, कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है। लगातार फिल्में और टीवी शो बनाने वाले प्रोडक्शन हाउस के पास बड़ी संख्या में कॉस्ट्यूम जमा होते हैं। इन्हें जरूरत के मुताबिक दूसरी फिल्मों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके लिए जरूरी नहीं कि पूरी पोशाक को उसी रूप में दोबारा पहना जाए। कभी उसमें बदलाव किया जाता है, तो कभी उसके कुछ हिस्सों को दूसरे कपड़ों के साथ जोड़ दिया जाता है।
इस तरह पुराने कॉस्ट्यूम का इस्तेमाल करके समय और लागत बचाई जा सकती है। हालांकि, किसी खास किरदार के लिए तैयार की गई पोशाक को दोबारा इस्तेमाल करना हमेशा आसान नहीं होता।
फिल्म में पहनी गई हर ड्रेस कलाकार की निजी संपत्ति नहीं होती। कपड़ा किसका है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किसने खरीदा, किसने तैयार किया और उसके लिए क्या समझौता हुआ था।
अगर कपड़ा प्रोडक्शन हाउस का है, तो उसे अपने पास रखने के लिए अनुमति की जरूरत हो सकती है। वहीं, किराये पर लिए गए कपड़ों को वापस करना पड़ता है।
कुछ मामलों में कलाकारों को खास पोशाकें यादगार के तौर पर दी जा सकती हैं। लेकिन यह मानना सही नहीं होगा कि शूटिंग खत्म होते ही सभी सितारे अपने पसंदीदा कपड़े घर ले जाते हैं।
पीरियड फिल्मों और शाही कहानियों में भारी हार, मुकुट, झुमके और दूसरे आभूषण किरदार को खास रूप देते हैं। लेकिन पर्दे पर दिखने वाले सभी गहने असली सोने या हीरे के नहीं होते। कई फिल्मों में नकली गहनों और हल्की धातुओं से बने आभूषण इस्तेमाल किए जाते हैं।
शूटिंग के बाद इन गहनों को भी दूसरे कॉस्ट्यूम और प्रॉप्स की तरह सुरक्षित रखा जा सकता है। किराये पर लिए गए गहने वापस कर दिए जाते हैं, जबकि प्रोडक्शन हाउस के सामान को दूसरी फिल्मों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
कुछ खास गहने किसी फिल्म के लिए ही तैयार किए जाते हैं। उनका आगे इस्तेमाल होगा या नहीं, यह उनकी स्थिति, डिजाइन और प्रोडक्शन की जरूरत पर निर्भर करता है।
फिल्मों में दिखने वाले महल, बड़े घर, अस्पताल और बाजार कई बार खास तौर पर शूटिंग के लिए बनाए जाते हैं। इन्हें तैयार करने में प्रोडक्शन डिजाइनर, आर्ट डायरेक्टर, बढ़ई, पेंटर और दूसरे कारीगर काम करते हैं।
शूटिंग पूरी होने के बाद सेट को हटाना पड़ सकता है, खासकर तब, जब वह किराये की जगह पर बनाया गया हो। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरा सामान फेंक दिया जाता है।
कई बार लकड़ी, दरवाजे, खिड़कियां, फर्नीचर और सजावटी हिस्सों को अलग करके सुरक्षित रख लिया जाता है। इनका इस्तेमाल दूसरी फिल्मों, विज्ञापनों या नए सेट तैयार करने में किया जा सकता है।
हालांकि, अस्थायी ढांचे और ऐसी चीजें, जिनका दोबारा इस्तेमाल संभव नहीं होता, उन्हें हटाना या नष्ट करना पड़ सकता है।
फिल्म में दिखने वाले सोफा, कुर्सियां, मेज, झूमर, पर्दे और बर्तन भी पर्दे पर माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
इनमें से कई चीजें प्रॉप हाउस से किराये पर ली जाती हैं। प्रॉप हाउस ऐसी जगह होती है, जहां फिल्मों और विज्ञापनों में इस्तेमाल होने वाला फर्नीचर और सजावटी सामान रखा जाता है। शूटिंग खत्म होने पर इन्हें वापस कर दिया जाता है।
कुछ सामान प्रोडक्शन टीम के पास भी रहता है। फर्नीचर का रंग, कपड़ा या सजावट बदलकर उसे किसी दूसरी फिल्म में नए रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे हर बार नया सामान खरीदने की जरूरत कम होती है।
कुछ फिल्मों में इस्तेमाल हुई पोशाकें और दूसरी चीजें दर्शकों के लिए यादगार बन जाती हैं। किसी लोकप्रिय गाने की ड्रेस या चर्चित सीन में इस्तेमाल हुई वस्तु का भावनात्मक महत्व बढ़ सकता है।
ऐसे में कुछ फिल्मी यादगारों की नीलामी की जा सकती है। कभी इनसे मिलने वाली रकम सामाजिक कार्यों के लिए भी दान की जाती है। हालांकि, यह हर फिल्म या हर पोशाक के साथ नहीं होता।
कुछ चीजें कलाकारों या प्रोडक्शन हाउस के निजी संग्रह में रखी जाती हैं, जबकि कुछ प्रदर्शनियों में भी दिखाई जा सकती हैं। किसी वस्तु की नीलामी या उसके सार्वजनिक प्रदर्शन का फैसला उसके मालिकाना हक और संबंधित व्यवस्था पर निर्भर करता है।
फिल्म की शूटिंग खत्म होने के बाद कपड़ों, गहनों और सेट की सामग्री को सुरक्षित रखने में जगह, समय और पैसे लगते हैं। कपड़ों को खराब होने से बचाना, गहनों का हिसाब रखना और बड़े सेट की सामग्री को अलग करके रखना आसान काम नहीं है।
इसी वजह से कुछ सामान दोबारा इस्तेमाल होता है, कुछ वापस कर दिया जाता है और कुछ को हटाना पड़ता है।
कैमरे के सामने कुछ मिनट नजर आने वाली ये चीजें पर्दे के पीछे लंबा सफर तय करती हैं। किसी फिल्म का लहंगा दूसरी कहानी का हिस्सा बन सकता है, तो किसी महल के दरवाजे और खिड़कियां नए सेट को सजाने के काम आ सकते हैं। यानी फिल्म खत्म होने के बाद भी उसकी दुनिया का कुछ हिस्सा अगली फिल्म की तैयारी में जुट जाता है।
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