
मनोरंजन डेस्क। आज के दौर में फिल्म का पोस्टर सोशल मीडिया पर रिलीज होते ही लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब बॉलीवुड की फिल्मों के पोस्टर हाथ से बनाए जाते थे। दिलचस्प बात यह है कि एक ही फिल्म के कई अलग-अलग पोस्टर देखने को मिलते थे। कहीं हीरो का चेहरा बड़ा होता था, तो कहीं हीरोइन को खास जगह दी जाती थी। कुछ पोस्टर में रोमांस, तो कुछ में एक्शन और बदले की कहानी दिखाई जाती थी। आखिर ऐसा क्यों होता था?
पुराने दौर में पोस्टर सिर्फ फिल्म का प्रचार करने का साधन नहीं थे, बल्कि दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने का अहम जरिया भी थे। शहरों की दीवारों, बाजारों, सिनेमाघरों के बाहर और सड़कों पर लगे पोस्टर देखकर ही लोग फिल्म के बारे में अंदाजा लगाते थे। इसलिए फिल्म की मार्केटिंग में पोस्टर की खास भूमिका होती थी।
आज पोस्टर डिजाइन करने के लिए डिजिटल पेंटिंग और फोटो एडिटिंग का इस्तेमाल होता है। लेकिन पुराने दौर में पोस्टर कलाकार बड़े कैनवास या कागज पर रंगों और ब्रश की मदद से चित्र बनाते थे। कलाकारों के चेहरे, कपड़े और भावों को इस तरह उभारा जाता था कि पोस्टर दूर से भी लोगों का ध्यान खींच सके।
कई बार कलाकारों की तस्वीरों को आधार बनाकर पेंटिंग तैयार की जाती थी। चेहरे और आंखों के भावों को ज्यादा प्रभावशाली बनाया जाता था। अलग-अलग डिजाइन तैयार करने में समय और मेहनत लगती थी। यही वजह है कि पुराने फिल्मी पोस्टर आज भारतीय सिनेमा की कला और इतिहास का अहम हिस्सा माने जाते हैं।
कई पोस्टर बनाने के पीछे सबसे बड़ी वजह फिल्म के अलग-अलग पहलुओं का प्रचार करना था। मान लीजिए, किसी फिल्म में रोमांस, एक्शन और पारिवारिक ड्रामा तीनों हैं। ऐसे में एक पोस्टर में हीरो-हीरोइन की जोड़ी दिखाई जा सकती थी, दूसरे में हीरो का एक्शन अवतार और तीसरे में परिवार या कहानी के दूसरे किरदारों को जगह मिल सकती थी।
इससे दर्शकों को फिल्म के अलग-अलग रंगों की झलक मिलती थी। कई बार मुख्य पोस्टर के अलावा कलाकारों, लोकप्रिय गानों या खास किरदारों को केंद्र में रखकर भी पोस्टर बनाए जाते थे। हालांकि, हर फिल्म के लिए कई पोस्टर बनाना जरूरी नहीं था। यह फिल्म के बजट और प्रचार की योजना पर निर्भर करता था।
पुराने पोस्टरों में कभी हीरो का चेहरा सबसे बड़ा दिखाई देता था, तो कभी हीरोइन को ज्यादा जगह मिलती थी। इसके पीछे कलाकारों की लोकप्रियता और फिल्म की कहानी दोनों की भूमिका होती थी।
अगर फिल्म किसी बड़े स्टार के नाम पर प्रचारित की जा रही थी, तो उसके चेहरे को प्रमुखता दी जाती थी। वहीं, महिला किरदार कहानी का अहम हिस्सा होता, तो पोस्टर में हीरोइन को ज्यादा जगह मिल सकती थी।
रोमांटिक फिल्मों में हीरो-हीरोइन की जोड़ी को उभारा जाता था, जबकि एक्शन फिल्मों में हीरो का आक्रामक अंदाज दिखाया जा सकता था। हालांकि, पोस्टर में किसी कलाकार का बड़ा चेहरा होना हमेशा उसकी भूमिका के महत्व का प्रमाण नहीं होता था। कई बार यह दर्शकों का ध्यान खींचने की रणनीति भी होती थी।
पुराने दौर में फिल्मों का प्रचार मुख्य रूप से सिनेमाघरों, दीवारों, बैनरों और होर्डिंग के जरिए होता था। अलग-अलग शहरों में प्रचार सामग्री की जरूरत और आकार बदल सकता था। कहीं बड़े होर्डिंग लगाए जाते थे, तो कहीं छोटे पोस्टर इस्तेमाल होते थे।
कई बार एक ही डिजाइन को अलग-अलग आकार में छापकर कई जगह लगाया जाता था। कुछ फिल्मों के लिए खास प्रचार सामग्री भी तैयार की जाती थी। इसलिए हर शहर के लिए अलग पोस्टर बनाना कोई जरूरी नियम नहीं था। प्रचार की योजना, छपाई और स्थानीय जरूरतों के आधार पर यह तय होता था कि किस तरह की सामग्री इस्तेमाल की जाएगी।
पुराने फिल्मी पोस्टरों में गुस्से में दिखता हीरो, रोती हुई हीरोइन, बंदूक, आग और बड़े-बड़े चेहरे आम नजर आते थे। इसका मकसद लोगों के मन में उत्सुकता पैदा करना था।
सड़क से गुजरते किसी व्यक्ति के पास पोस्टर को देर तक देखने का समय नहीं होता था। इसलिए चित्रों और रंगों के जरिए फिल्म का मिजाज तुरंत समझाने की कोशिश की जाती थी। एक्शन फिल्म में संघर्ष, रोमांटिक फिल्म में प्यार और रहस्य से जुड़ी फिल्म में डर या तनाव दिखाया जा सकता था।
कई बार पोस्टर के लिए कलाकारों को अलग अंदाज में चित्रित किया जाता था। जरूरी नहीं कि पोस्टर में दिखाई गई तस्वीर फिल्म के किसी वास्तविक दृश्य की हूबहू नकल हो। इसका उद्देश्य फिल्म को ज्यादा प्रभावशाली तरीके से पेश करना था।
लाल, पीला, नीला और हरा जैसे चमकीले रंग पुराने पोस्टरों की खास पहचान थे। इनका इस्तेमाल पोस्टर को दूर से आकर्षक बनाने के लिए किया जाता था। रोमांस, एक्शन और अपराध जैसी अलग-अलग शैलियों के लिए रंगों और चित्रों का चुनाव भी अलग हो सकता था।
एक ही फिल्म के पोस्टरों में अंतर होने की वजह अलग कलाकारों की शैली, डिजाइन या छपाई की प्रक्रिया भी हो सकती थी। इसलिए हर बदलाव के पीछे कोई बड़ी मार्केटिंग रणनीति होना जरूरी नहीं था।
आज फिल्मों के टीजर पोस्टर, किरदारों के पोस्टर, गानों के पोस्टर और रिलीज डेट वाले डिजाइन डिजिटल माध्यम से तेजी से तैयार किए जाते हैं। इन्हें सोशल मीडिया पर कुछ ही मिनटों में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचाया जा सकता है।
पहले पोस्टर तैयार करने, छपवाने और अलग-अलग जगह पहुंचाने में समय लगता था। हाथ से बने पोस्टरों में कलाकारों की मेहनत और उनकी व्यक्तिगत शैली दिखाई देती थी। आज तकनीक ने इस प्रक्रिया को आसान बना दिया है, लेकिन दोनों दौर में मकसद एक ही रहा है- दर्शकों का ध्यान खींचना और उन्हें फिल्म देखने के लिए प्रेरित करना।
पुराने बॉलीवुड पोस्टर इसलिए भी खास हैं, क्योंकि वे अपने दौर की कला, कलाकारों की लोकप्रियता और फिल्मी मार्केटिंग के तरीकों की झलक दिखाते हैं। एक ही फिल्म के कई पोस्टर केवल अलग-अलग तस्वीरें नहीं थे, बल्कि फिल्म को अलग अंदाज में पेश करने और दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ाने का माध्यम भी थे। यही वजह है कि आज भी ये पोस्टर भारतीय सिनेमा की यादगार विरासत का हिस्सा बने हुए हैं।