
मनोरंजन डेस्क। बॉलीवुड की फिल्मों में अक्सर हीरो कहानी का अट्रैक्शन होता है। उसी के स्ट्रगल, प्यार और जीत के इर्द-गिर्द पूरी कहानी घूमती है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि फिल्म खत्म होने के बाद ऑडियंस को हीरो से ज्यादा उसका विलेन याद रहता है। उसके डायलॉग, कपड़े, हंसी और खतरनाक अंदाज लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं। कभी गब्बर सिंह का नाम सुनते ही उसकी डरावनी हंसी याद आती है, तो कभी मोगैम्बो का ‘मोगैम्बो खुश हुआ’ वाला डायलॉग दिमाग में गूंजने लगता है।
सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? जिस किरदार को कहानी में हराने के लिए बनाया जाता है, वही कई बार सबसे ज्यादा लोकप्रिय कैसे हो जाता है? इसके पीछे सिर्फ एक्टर की एक्टिंग नहीं, बल्कि किरदार की बनावट, उसकी अलग पहचान और ऑडियंस की मनोवैज्ञानिक दिलचस्पी भी काम करती है।
साल 1975 में रिलीज हुई फिल्म Sholay का गब्बर सिंह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अमजद खान ने इस किरदार को जिस अंदाज में निभाया, उसने हिंदी सिनेमा के विलेन की पहचान ही बदल दी। गब्बर सिर्फ एक डाकू नहीं था। उसकी बोलने की शैली, बेखौफ व्यवहार और अजीब-सा हास्य उसे दूसरे किरदारों से अलग बनाता था।
‘कितने आदमी थे?’ जैसा डायलॉग फिल्म की कहानी से निकलकर आम बोलचाल का हिस्सा बन गया। गब्बर की लोकप्रियता की एक वजह यह भी थी कि उसका अगला कदम समझना आसान नहीं था। ऑडियंस को नहीं पता होता था कि वह कब हंसेगा, कब गुस्सा करेगा और कब हिंसक हो जाएगा। यही अनिश्चितता उसके किरदार को दिलचस्प बनाती थी।
इसी तरह, 1987 की फिल्म Mr. India में अमरीश पुरी का मोगैम्बो भी यादगार विलेन बना। उसका खास पहनावा, बैठने का अंदाज और संवाद बोलने का तरीका उसे एक अलग पहचान देता था। मोगैम्बो का किरदार इतना नाटकीय था कि वह सिर्फ हीरो के सामने खड़ा विरोधी नहीं, बल्कि अपने आप में एक बड़ा आकर्षण बन गया।
किसी विलेन को यादगार बनाने के लिए उसका खतरनाक होना ही काफी नहीं है। कई बार उसकी सोच और उसके व्यवहार के पीछे छिपी कहानी भी ऑडियंस को आकर्षित करती है। फिल्म Darr में शाहरुख खान ने राहुल नाम के ऐसे किरदार को निभाया, जो प्यार के जुनून में खतरनाक हो जाता है। फिल्म में सनी देओल हीरो थे, लेकिन राहुल का डरावना जुनून और उसका संवाद ‘आई लव यू, क-क-क-किरण’ ऑडियंस के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ।
इसका एक और उदाहरण फिल्म Baazigar है। इसमें शाहरुख खान का किरदार अजय शर्मा बदले की आग में जल रहा होता है। वह पारंपरिक हीरो की तरह सही-गलत के सीधे रास्ते पर नहीं चलता। इसके बावजूद दर्शक उसकी कहानी में दिलचस्पी लेते हैं, क्योंकि फिल्म उसके फैसलों और उसके अतीत को समझने का मौका देती है।
यहीं फिल्मों का एक दिलचस्प पहलू सामने आता है। दर्शक हमेशा अच्छे और बुरे किरदारों को ही नहीं देखते, बल्कि ऐसे किरदारों में भी दिलचस्पी लेते हैं जो उन्हें चौंकाते हैं, परेशान करते हैं या सोचने पर मजबूर करते हैं।
कई बार विलेन की लोकप्रियता की वजह उसका संवाद और उसे निभाने वाले एक्टर का अंदाज होता है। फिल्म Wanted में प्रकाश राज के गनी भाई और Dabangg में सोनू सूद के छेदी सिंह जैसे किरदारों ने अपनी अलग पहचान बनाई। वहीं, Agneepath के 2012 वाले संस्करण में संजय दत्त का कांचा चीना अपने डरावने रूप और बेरहम व्यवहार के कारण चर्चा में रहा।
इन किरदारों की खासियत यह है कि वे कहानी में आते ही माहौल बदल देते हैं। उनके सामने हीरो की चुनौती बड़ी दिखाई देने लगती है। विलेन जितना प्रभावशाली होता है, हीरो की जीत उतनी ही मुश्किल और रोमांचक लग सकती है।
इसमें एक्टर की भूमिका भी अहम होती है। आवाज में उतार-चढ़ाव, आंखों के हावभाव, शरीर की भाषा और संवाद बोलने का तरीका किसी सामान्य किरदार को भी यादगार बना सकता है। अमरीश पुरी, अमजद खान और प्राण जैसे कलाकारों ने अलग-अलग दौर में अपने विलेन वाले किरदारों से यही साबित किया।
जरूरी नहीं कि किसी विलेन का लोकप्रिय होना फिल्म की सफलता की गारंटी हो। फिल्म की कहानी, डायरेक्टर, संगीत और दूसरे किरदार भी उसकी सफलता में भूमिका निभाते हैं। लेकिन मजबूत विलेन कहानी में तनाव पैदा करता है और ऑडियंस को यह जानने के लिए उत्सुक रखता है कि आखिर हीरो उससे कैसे निपटेगा।
विलेन की लोकप्रियता का एक कारण यह भी हो सकता है कि उसे कहानी में ऐसे काम करने की छूट मिलती है जो हीरो नहीं कर सकता। वह नियम तोड़ता है, खुलकर गुस्सा दिखाता है और कई बार अपनी बात बेखौफ होकर कहता है। दर्शक उसके कामों का समर्थन किए बिना भी उसके आत्मविश्वास और अभिनय से प्रभावित हो सकते हैं।
यही वजह है कि कई फिल्मों में हीरो कहानी जीत जाता है, लेकिन ऑडियंस की यादों में विलेन अपनी अलग जगह बना लेता है।
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