
लाइफस्टाइल डेस्क। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 की क्रांति) में अपने प्राणों की आहुति देने वाले कई ऐसे जनजातीय योद्धा रहे हैं, जिनका बलिदान इतिहास के पन्नों में कहीं ओझल हो गया। ऐसे ही एक महान आदिवासी क्रांतिवीर सीताराम कंवर की अदम्य वीरता का प्रमाण मध्य प्रदेश पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय में संरक्षित 168 वर्ष पुराने दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज (विज्ञप्ति) से उजागर हुआ है।
कंवर जनजाति से आने वाले क्रांतिकारी सीताराम कंवर ने निमाड़ अंचल में अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं। उन्हें पकड़ने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश प्रभाव वाले होलकर दरबार ने 200 रुपये का नकद इनाम घोषित किया था। 3,000 लड़ाकों की सेना के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुए यह वीर योद्धा 9 अक्टूबर 1858 को रणभूमि में बलिदान हुआ था।
वर्ष 1858 में होलकर रियासत द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के फरमान पर जारी इस विज्ञप्ति में सीताराम कंवर की गतिविधियों और उनके बढ़ते प्रभाव का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। विज्ञप्ति के अनुसार:
इस विस्मृत स्वतंत्रता सेनानी के इतिहास को पुनर्जीवित करने का श्रेय आदिवासी समाज के निरंतर प्रयासों को जाता है:
अखिल भारतीय कंवर आदिवासी विकास समिति (शहडोल) के सदस्य अशोक कंवर ने बड़वानी के करंजा चौक स्थित बलिदानी स्मारक में सीताराम कंवर का नाम अंकित कराने के लिए जिला प्रशासन से मांग की थी।
प्रशासन द्वारा ऐतिहासिक साक्ष्य मांगे जाने पर उन्होंने 'राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग' को पत्र लिखा, जहां से मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग को खोजबीन के निर्देश जारी हुए।
पुरातत्व अभिलेखागार में गहन शोध के बाद होलकर रियासतकालीन हस्तलिखित दस्तावेज खोज निकाले गए।
यह मूल विज्ञप्ति मराठी भाषा और मोड़ी लिपि में दर्ज थी। पुरातत्व संचालनालय के भाषा विशेषज्ञ सैयद नईमुद्दीन ने इसका हिंदी में प्रामाणिक अनुवाद किया। इसके उपरांत पुरालेख अधिकारी पदम सिंह मीणा द्वारा सत्यापित प्रति समाज को उपलब्ध कराई गई।
पुरातत्व संचालनालय एवं अभिलेखागार की संयुक्त संचालक डॉ. मनीषा शर्मा ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है कि अभिलेखागार में संरक्षित तत्कालीन होलकर रियासत के मोड़ी/मराठी लिपि के मूल अभिलेखों में सीताराम कंवर के क्रांतिकारी संघर्ष, उनकी गिरफ्तारी के लिए घोषित इनाम और उनकी वीरता का संपूर्ण व प्रामाणिक ब्योरा दर्ज है।
9 अक्टूबर 1858 को मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी सीताराम कंवर का यह आधिकारिक साक्ष्य न केवल जनजातीय इतिहास का गौरव बढ़ाता है, बल्कि 1857 के जनक्रांति आंदोलन में आदिवासी समाज के सर्वोच्च योगदान को भी ऐतिहासिक रूप से रेखांकित करता है।
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