डिजिटल डेस्क। 'खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी…' रानी लक्ष्मीबाई का नाम आते ही आंखों के सामने एक ऐसी वीरांगना की तस्वीर उभरती है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के सामने घुटने टेकने के बजाय रणभूमि में अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
पीठ पर बेटे को बांधकर, घोड़े की लगाम मुंह में दबाए और दोनों हाथों से तलवार चलाते हुए युद्ध करती रानी लक्ष्मीबाई की छवि आज भी लोगों के मन में जीवंत है।
यह कहानी है उदासीन परंपरा के संत बाबा गंगादास की
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लेकिन रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की इस प्रचलित कहानी के पीछे इतिहास का एक ऐसा अध्याय भी है, जिसके नायक को अपेक्षित पहचान नहीं मिल पाई। यह कहानी है उदासीन परंपरा के संत और खड़ी बोली के महाकवि बाबा गंगादास की।
दावा किया जाता है कि ग्वालियर के युद्ध में घायल होने के बाद रानी लक्ष्मीबाई को बाबा गंगादास की झोपड़ी में ले जाया गया था। अंग्रेजों के हाथ रानी का शव न लगे, इसके लिए बाबा ने अपनी कुटिया तोड़कर उनकी चिता तैयार की और अंतिम संस्कार कराया।
उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले से जुड़ी बाबा गंगादास की यह गाथा केवल एक संत की कहानी नहीं, बल्कि 1857-58 के स्वतंत्रता संग्राम में साधु-संतों की भूमिका और उनके बलिदान की याद भी दिलाती है।
कौन थे बाबा गंगादास, जिनके आश्रम में पहुंची थीं घायल रानी?
बाबा गंगादास का संबंध उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के बाबूगढ़ क्षेत्र स्थित गांव रसूलपुर से बताया जाता है। वह उदासीन परंपरा के संत होने के साथ खड़ी बोली के प्रमुख कवि भी थे। उनका ग्वालियर स्थित मठ स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों की गतिविधियों से जुड़ा बताया जाता है।
स्थानीय विवरणों के अनुसार, बाबा गंगादास केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं थे। वह युवाओं को युद्ध का प्रशिक्षण भी देते थे। बंदूक, भाला, तलवार और कटार चलाने में निपुण बाबा अपने आश्रम में क्रांतिकारियों को युद्धकला सिखाते थे।
उनके व्यक्तित्व का यही पहलू उन्हें दूसरे संतों से अलग बनाता है। एक ओर वह साहित्य और अध्यात्म से जुड़े थे, तो दूसरी ओर देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले लोगों की सहायता भी करते थे।
रानी लक्ष्मीबाई और बाबा गंगादास की गुप्त मुलाकात
कथाओं और स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में वर्ष 1858 के दौरान रानी लक्ष्मीबाई और बाबा गंगादास के बीच एक गोपनीय मुलाकात का उल्लेख मिलता है। उस समय अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष निर्णायक दौर में पहुंच चुका था।ग्वालियर में अंग्रेजी सेना के साथ संघर्ष के दौरान रानी लक्ष्मीबाई गंभीर रूप से घायल हो गईं।
बताया जाता है कि उनके सैनिक उन्हें लेकर बाबा गंगादास के आश्रम पहुंचे। रानी की हालत बेहद नाजुक थी और उनके जीवन की उम्मीदें तेजी से कम होती जा रही थीं।
रानी ने पुत्र दामोदर राव की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई
इसी कठिन घड़ी में रानी लक्ष्मीबाई ने अपने पुत्र दामोदर राव की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। स्थानीय विवरणों के अनुसार, उन्होंने बाबा गंगादास से बेटे को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की अपील की। हालांकि कुछ विवरण में बेटे को वाराणसी भेजने की बात भी कही गई है।
किवदंती यह भी है कि रानी लक्ष्मीबाई अपने बेटे की सुरक्षा के लिए अपना हार तक उतारकर देना चाहती थीं, लेकिन बाबा ने उसे स्वीकार नहीं किया। यह प्रसंग रानी के जीवन के उस पक्ष को सामने लाता है, जिसमें रणभूमि की वीरांगना अपने अंतिम क्षणों में एक मां की तरह अपने बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतित थी।
बाबा की गोद में ली अंतिम सांस, गंगाजल पिलाने का भी उल्लेख
रानी लक्ष्मीबाई के अंतिम क्षणों से जुड़ा एक मार्मिक विवरण यह भी है कि बाबा गंगादास ने उनका सिर अपनी गोद में रखा और उन्हें गंगाजल पिलाया। इसी दौरान रानी ने कथित तौर पर इच्छा जताई कि उनका शव अंग्रेजों के हाथ नहीं लगना चाहिए।
बताया जाता है कि बाबा गंगादास ने रानी की इस अंतिम इच्छा को पूरा करने का संकल्प लिया। रानी का बलिदान होने के बाद उनके पार्थिव शरीर को अंग्रेजी सैनिकों से सुरक्षित रखने की चुनौती सामने थी। हालांकि, रानी लक्ष्मीबाई के अंतिम क्षणों से जुड़े इन विवरणों की पुष्टि के लिए ऐतिहासिक स्रोतों का अलग-अलग परीक्षण जरूरी है।
फिर भी, स्थानीय परंपराओं में बाबा गंगादास का नाम रानी लक्ष्मीबाई की अंतिम यात्रा और उनके पुत्र की सुरक्षा से जोड़कर याद किया जाता है।
कुटिया तोड़कर बनाई चिता, अंग्रेजों को नहीं मिला रानी का शव
स्थानीय विवरणों में दावा किया जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान के बाद अंग्रेजी सैनिकों ने बाबा गंगादास के मठ पर हमला कर दिया था। ऐसे में रानी का अंतिम संस्कार करना और उनके पार्थिव शरीर को अंग्रेजों से बचाना बेहद कठिन हो गया था।
आश्रम में चिता तैयार करने के लिए पर्याप्त लकड़ियां नहीं थीं। बताया जाता है कि बाबा गंगादास ने देर किए बिना अपनी कुटिया तुड़वा दी और उसकी लकड़ियों से रानी की चिता तैयार कराई। इस बीच मठ के साधु अंग्रेजी सैनिकों का मुकाबला करते रहे। जब अंग्रेजी सैनिक चिता तक पहुंचे, तब तक रानी का अंतिम संस्कार हो चुका था।
इस तरह बाबा गंगादास और उनके आश्रम के साधुओं की भूमिका रानी लक्ष्मीबाई के अंतिम संस्कार से जुड़ी एक ऐसी गाथा के रूप में सामने आती है, जिसमें बलिदान, साहस और देश के प्रति समर्पण की भावना दिखाई देती है।
रानी के बेटे दामोदर राव को सुरक्षित पहुंचाने का दावा
रानी लक्ष्मीबाई के पुत्र दामोदर राव को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने का श्रेय भी बाबा गंगादास को दिया जाता है। बताया जाता है कि रानी ने अंतिम समय में बेटे की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी, जिसके बाद उन्होंने उसे सुरक्षित रखने की व्यवस्था की।
यह प्रसंग रानी की वीरता के साथ-साथ उनके मातृत्व और बाबा गंगादास के त्याग को भी रेखांकित करता है। हालांकि, इस घटना के अलग-अलग विवरणों को प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों से मिलाकर देखना जरूरी है, ताकि लोकपरंपरा और दस्तावेजी इतिहास के बीच अंतर स्पष्ट रह सके।
1972 से आयोजित हो रहा कुश्ती का दंगल
बाबा गंगादास की स्मृति आज भी हापुड़ क्षेत्र में जीवित है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1972 से उनकी स्मृति में हर साल विशाल कुश्ती दंगल आयोजित किया जाता है। इसमें देशभर के नामचीन पहलवान हिस्सा लेते हैं। बताया जाता है कि वर्ष 1976 में गांव में उनकी समाधि का निर्माण कराया गया था। हापुड़ में भी उनसे जुड़े मंदिर और समाधि स्थल मौजूद होने की बात कही जाती है।
ग्रामीण प्रवीण शर्मा, पवनवीर सिंह, राहुल त्यागी और मुकेश त्यागी के अनुसार, बाबा गंगादास ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हजारों युवाओं को युद्ध का प्रशिक्षण दिया था। उनके मुताबिक, बाबा की स्मृति में आयोजित दंगल नई पीढ़ी को उनके योगदान से जोड़ने का माध्यम है।
इतिहास के पन्नों में उचित पहचान का इंतजार
बाबा गंगादास की कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन पहलुओं की ओर ध्यान खींचती है, जिनका उल्लेख आम जनमानस में अपेक्षाकृत कम होता है। रानी लक्ष्मीबाई की वीरता देश के इतिहास में अमर है, लेकिन उनसे जुड़ी अंतिम घटनाओं के संदर्भ में बाबा गंगादास का नाम भी स्थानीय स्मृतियों और परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
हापुड़ से ग्वालियर तक उनसे जुड़ी स्मृतियां आज भी मौजूद
हापुड़ से ग्वालियर तक उनसे जुड़ी स्मृतियां आज भी मौजूद हैं। अब जरूरत इस बात की है कि बाबा गंगादास के साहित्यिक योगदान, उनके मठ की भूमिका और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दावों पर प्रमाण-आधारित शोध को बढ़ावा दिया जाए।
क्योंकि आजादी की लड़ाई केवल रणभूमि में तलवार उठाने वालों की कहानी नहीं है। इसमें उन लोगों का योगदान भी शामिल है, जिन्होंने संकट के समय क्रांतिकारियों को सहारा दिया, जोखिम उठाया और अपने स्तर पर संघर्ष को आगे बढ़ाया। बाबा गंगादास की गाथा भी इसी व्यापक इतिहास को समझने की एक कड़ी है।