क्या आपके बच्चे की मेंटल हेल्थ अच्छी है…स्वभाव में बदलाव हमेशा नॉर्मल नहीं, माता-पिता कैसे समझें बच्चे की भावनाएं?
बच्चों के स्वभाव में अकेलापन, चिड़चिड़ापन और खान-पान में बदलाव मानसिक तनाव के लक्षण हो सकते हैं, जिन्हें सही समय पर समझकर पॉजिटिव पेरेंटिंग अपनाना बेह...और पढ़ें
By Akriti KumariEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Wed, 05 Aug 2026 10:27:57 AM (IST)Updated Date: Wed, 05 Aug 2026 10:28:32 AM (IST)
बच्चों की मेंटल-इमोशनल हेल्थ को समझने के लिए बच्चे से बातचीत करना जरूरी। (फाइल फोटो)HighLights
- बच्चों में अकेलापन, गुस्सा, चिड़चिड़ापन, और नींद या भूख मानसिक तनाव का संकेत हो सकते हैं
- घर में पॉजिटिव पेरेंटिंग और बिना तुलना किए क्वालिटी टाइम देना बच्चों के लिए बेहद जरूरी है
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली. आज की लाइफस्टाइल में बच्चों मेंटल और इमोशनल हेल्थ एक बेहद संवेदनशील और जरूरी विषय है। बच्चों के स्वभाव में समय के साथ बदलाव आना नॉर्मल है, लेकिन यह समझना माता-पिता की जिम्मेदारी है कि बच्चा सामान्य बदलाव से गुजर रहा है या किसी मानसिक तनाव से।
अक्सर बच्चे अपनी भावनाओं, डर या परेशानी को शब्दों में बयां नहीं कर पाते। ऐसे में उनका व्यवहार ही उनकी स्थिति का दर्पण बनता है।
बच्चों में मानसिक तनाव या समस्या के लक्षण
यदि बच्चे के व्यवहार में नीचे दिए गए बदलाव दिखाई दें, तो माता-पिता को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए-
- अत्यधिक अकेलापन (Social Withdrawal): दोस्तों या परिवार के सदस्यों से अचानक दूरी बना लेना और खुद को कमरे में बंद रखना।
- चिड़चिड़ापन और गुस्सा: छोटी-छोटी बातों पर अत्यधिक हुस्सा होना, चिल्लाना, जिद करना या चीजें फेंकना।
- खान-पान और नींद में बदलाव: अचानक भूख पूरी तरह खत्म हो जाना या बहुत अधिक खाना। रात में नींद न आना, डरावने सपने देखना या दिनभर सोते रहना।
- आत्मविश्वास की कमी: खुद को लेकर लगातार नकारात्मक बातें करना (जैसे- मैं किसी काम का नहीं हूं या मुझसे यह नहीं होगा)।
- स्कूल की गतिविधियों में मन न लगना और एकाग्रता में कमी आना।
घर का माहौल और पॉजिटिव पेरेंटिंग
घर का माहौल बच्चे के विकास की नींव होता है। इसे सुरक्षित और सकारात्मक बनाने के लिए माता-पिता को कुछ आदते अपनानी चाहिए-
- क्वालिटी टाइम बिताएं- रोजाना कम से कम 20-30 मिनट बच्चों के साथ ऐसे बिताएं जहां मोबाइल, टीवी या लैपटॉप जैसे स्क्रीन न हों।
- सहानुभूति से सुनें: बच्चों की छोटी-छोटी बातों और शिकायतों को बिना टोके या उनका मजाक उड़ाए ध्यान से सुनें।
- बिना शर्त स्वीकार्यता (Unconditional Acceptance): बच्चों में यह विश्वास जगाएं कि वे जैसे भी हैं, उनसे प्यार किया जाता है।
- तुलना न करें: दूसरे बच्चों से तुलना करने या बात-बात पर डांटने के बजाय उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की सराहना करें।
- गलतियों से सीखने का अवसर दें: गलतियों पर कठोर सजा देने के बजाय उन्हें यह समझाएं कि गलतियां सीखने की प्रक्रिया का एक हिस्सा हैं।
जब घर में प्यार, विश्वास और सुरक्षा का माहौल होता है, तो बच्चे खुलकर अपनी बातें साझा करते हैं। यदि व्यवहार में आए बदलाव लंबे समय तक बने रहें, तो किसी Child Psychologist या स्पेशलिस्टकी सलाह लेने में हिचकिचाना नहीं चाहिए।