
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। मोबाइल, लैपटाप और कंप्यूटर पर बढ़ती निर्भरता के साथ हाथों और कलाई से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। अंगुलियों में झुनझुनी, सुन्नपन, अंगूठे में दर्द, कलाई में असहजता और हाथों में कमजोरी जैसी शिकायतें अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक लगातार टाइपिंग, माउस का उपयोग, मोबाइल स्क्रालिंग और गेमिंग के कारण युवाओं और कामकाजी वर्ग में भी ये समस्याएं बढ़ रही हैं।
सबसे अधिक यह समस्या माउस के उपयोग के कारण होती है। कई लोग इन्हें सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह कार्पल टनल सिंड्रोम, रिपिटेटिव स्ट्रेन इंजरी (आरएसआई) या नसों पर दबाव बढ़ने का शुरुआती संकेत हो सकता है।
डॉक्टर बताते हैं कि आईटी प्रोफेशनल, बैंक कर्मचारी, पत्रकार, विद्यार्थी, कंटेंट क्रिएटर और लंबे समय तक कंप्यूटर पर काम करने वाले लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं। लगातार एक जैसी गतिविधियां करने से हाथों की नसों, मांसपेशियों और टेंडन पर दबाव बढ़ता है, जिससे धीरे-धीरे दर्द और कार्यक्षमता में कमी आने लगती है।
समस्या की शुरुआत अक्सर हल्की झुनझुनी या अंगुलियों के सुन्न होने से होती है। कई लोगों को अंगूठे में दर्द, कलाई में भारीपन, हाथों में थकान और पकड़ कमजोर होने की शिकायत भी होती है। कुछ मामलों में अंगुलियों के लाक होने या क्लिक जैसी आवाज आने की समस्या भी सामने आती है।
यदि इन संकेतों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है। शुरुआती अवस्था में पहचान होने पर अधिकांश मामलों का उपचार संभव है, लेकिन लगातार बिना आराम किए काम करने और चिकित्सकीय सलाह न लेने पर नसों पर स्थायी दबाव पड़ सकता है। गंभीर मामलों में हाथों की पकड़ कमजोर हो सकती है, अंगुलियों की गति प्रभावित हो सकती है।
डिजिटल युग की नई चुनौती
विशेषज्ञों के मुताबिक डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग के कारण यह समस्या अब जीवनशैली से जुड़ी बीमारी का रूप ले रही है। पहले जहां ऐसे मामले सीमित संख्या में आते थे, वहीं अब कम उम्र के युवाओं और विद्यार्थियों में भी इनकी शिकायत बढ़ रही है।
माउस का अधिक उपयोग करने के कारण कार्पल टनल सिंड्रोम की समस्या होने लगी है। बड़ी संख्या में युवा इसका उपचार करवाने के लिए आ रहे हैं। इसका पता नर्व कंडक्शन टेस्ट और सोनोग्राफी के माध्यम से लगाया जाता है। यदि लक्षणों को नजरअंदाज करते हैं तो मांसपेशियां सिकुड़ने लगती हैं। इसके उपचार में पीआरपी थेरेपी, इंजेक्शन भी आ गए हैं। -डॉ. प्रवेश काठेड़, स्पाइन और दर्द प्रबंधन विशेषज्ञ