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घर बैठे करें मायोपिया स्क्रीनिंग, जेनेटिक कारणों से हो सकती है कमजोर नजर

परिजन बच्चों को जांच के लिए अस्पताल लेकर तब पहुंचते हैं जब बच्चा शिकायत करने लगता है कि उसे धुंधला दिखाई देने लगा है।

By Navodit SaktawatEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Thu, 01 Oct 2026 11:05:48 AM (IST)Updated Date: Thu, 01 Oct 2026 12:18:06 PM (IST)
घर बैठे करें मायोपिया स्क्रीनिंग, जेनेटिक कारणों से हो सकती है कमजोर नजर
मायोपिया।

HighLights

  1. बच्‍चा पीछे की बेंच से वह आगे बैठने लगता है।
  2. इसके बाद घर पर टीवी पास से देखने लगता है।
  3. जब कमजोरी होती है कम दिखना शुरू होता है।

नीरज व्यास, इंदौर। इस दुनिया की सारी रंगीनियत हमारी आंखों से ही है, लेकिन अगर बचपन में ही नजर कमजोर होने लगे तो ये बच्चे के साथ परिजनों के लिए भी चिंता की बात है।

एमवाय अस्पताल की ओपीडी में इन दिनों आंखों की जांच कराने पहुंच रहे पांच से 12 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की नजर कमजोर होने का आंकड़ा चौंकाने वाला है। हर सौ में से तीस बच्चों की आंखें कमजोर निकल रही हैं और उन्हें चश्मा लग रहा है।

इतना ही नहीं चश्मे का नंबर भी हाई है। बावजूद इसके ज्यादातर परिजन इस बात से अनजान हैं कि उनके बच्चों की आंखे काफी समय पहले ही कमजोर हो चुकी हैं। परिजन बच्चों को जांच के लिए अस्पताल लेकर तब पहुंचते हैं जब बच्चा शिकायत करने लगता है कि उसे धुंधला दिखाई देने लगा है।


तब तक बहुत समय निकल जाता है। हाई नंबर का चश्मा एकाएक ही नहीं लगता है, बल्कि ये एक धीमी प्रक्रिया है। एमवायएच के नेत्ररोग विभाग की विभागाध्यक्ष प्रीति रावत के अनुसार नजर धीरे-धीरे कमजोर होती है। बच्चे को शुरुआत में इसका पता नहीं लगता है।

स्कूल में पीछे की बेंच से वह आगे बैठने लगता है। घर पर टीवी पास से देखने लगता है। कमजोरी तब महसूस होती है जब कम दिखना शुरू होता है, तब तक आंखें का नंबर हाई हो जाता है।

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बच्चों में तेजी से बढ़ रही मायोपिया की समस्या, बढ़ती स्क्रीन टाइम इसकी सबसे बड़ी वजह, 20-20-20 रूल से हो सकता है बचाव

मोबाइल से कमजोर हो रही आंखें

डाक्टरों के अनुसार आंखें कमजोर होने की सबसे बड़ी वजह मोबाइल बन रहा है। कम उम्र में बच्चे इसके आदी हो रहे हैं। ज्यादा देर तक स्क्रीन टाइम गुजारने पर यह आंखों के लिए जहर की तरह काम कर रहा है।

जेनेटिक कारणों से हो सकती हैं कमजोर नजर

नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. विवेक भंडारी के अनुसार ब्रेन के पास जब पास देखने का सिग्नल बार-बार जाता है तो वह दूर का देखना छोड़ देता है। सिंगापुर आइ इंस्टीट्यूट की स्टडी कहती है कि बच्चा अगर 2 घंटे से कम घर के बाहर खेलता है तो उसे चश्मा लगने की संभावना 50 प्रतिशत तक हो सकती है। अगर मां-बाप में से किसी एक को चश्मा लगा है तो बच्चे को चश्मा लगने के हाई चांसेस हो जाते हैं।

इन तरीकों से आंखें रहेंगी स्वस्थ

बच्चों की आंखें स्वस्थ्य रखना है तो उनकी डाइट में तीन चीजें दही, आंवला और अमरूद को शामिल करें। इसके साथ ही रोजाना 8 घंटे की नींद आंखों की रोशनी को बेहतर बनाए रखने में काफी मददगार रहेगी।

घर बैठे करें मायोपिया स्क्रीनिंग

आप अगर घर बैठे ही बच्चे की आंखों की स्थिति जानना चाहते हैं तो मायोपिया स्क्रीनिंग कर सकते हैं। इसमें बच्चे की पहले एक आंख बंद कर देखने दें और फिर उसके बाद दूसरी आंख बंद कर देखने दें। अगर आंखें स्वस्थ्य हैं तो देखने में दिक्कत नहीं होगी। अगर किसी भी आंख से कम दिखता महसूस हो तो तुरंत डाक्टर को दिखाएं।

खानपान भी कमजोरी की वजह

आजकल ज्यादातर पैरेंट्स वर्किंग हो गए हैं। इसका असर बच्चे की सेहत पर पड़ रहा है। सही खानपान न होने से सही न्यूट्रिशन नहीं मिल पाता, बच्चे दिनभर घर में रहते हैं और ज्यादातर बच्चे मोबाइल, टीवी देखते रहते हैं, इसकी वजह से आंखें कमजोर होने लगती हैं।

पैरेंट्स ध्यान रखें ये बातें

- बच्चों की आंखों की नियमित जांच कराएं।

- समय-समय पर घर पर ही मायोपिया स्क्रीनिंग करें।

- बच्चे की आंखों से जुड़ी शिकायत को अनदेखा न करें।

- पौष्टिक आहार सुनिश्चित करें, सोने का शेड्यूल सरी रखें।

- बच्चों को ज्यादा वक्त तक मोबाइल, टीवी देखने न दें।