
लाइफस्टाइल डेस्क: आज के सोशल मीडिया युग में कंटेंट की कोई कमी नहीं है। हर बार ऐप खोलते ही कुछ ही सेकंड के भीतर दर्जनों रील्स सामने आ जाती हैं। खाना बनाने के वीडियो, मेकअप करने, फैशन, मोटिवेशन, यात्रा, डॉग वॉक या किसी विषय पर जानकारी, सबकुछ रील्स के छोटे फ्रेम में समा चुका है। इस अंतहीन कंटेंट की वजह से लोग अपना काफी समय केवल स्क्रॉलिंग में बिताने लगे हैं।
इसे ही “डूम स्क्रॉलिंग” (Doom Scrolling Effects) कहा जाता है, यानी लगातार वीडियो देखते रहना, भले ही उससे कोई लाभ (Effects of Watching Reels) न हो। विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवहार अब सिर्फ समय की बर्बादी नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालने (Mental Health Impact of Social Media) वाला पैटर्न बन रहा है, जिसे “ब्रेन रॉट” (Brain Rot) कहा जाता है।
‘ब्रेन रॉट’ शब्द मूल रूप से Gen-Z स्लैंग के रूप में इस्तेमाल हुआ, लेकिन अब वैज्ञानिक रूप से भी इसे गंभीर मानसिक थकान, ब्रेन फॉग, फोकस की कमी और सीखने की क्षमता घटने से जोड़कर देखा (Brain Rot Symptoms) जाने लगा है। लगातार शॉर्ट वीडियो देखने से दिमाग हर सेकंड नए उत्तेजनाओं का आदी हो जाता है, जिससे उसकी स्थिरता और काम करने की क्षमता कम हो जाती है।
कई रिसर्च इस प्रभाव को साबित करती हैं। एक हालिया मेटा-एनालिसिस, जिसमें 71 स्टडीज़ और लगभग एक लाख प्रतिभागी शामिल थे, में पाया गया कि शॉर्ट वीडियो देखने की आदत फोकस और सेल्फ कंट्रोल कमजोर कर देती है। इसके साथ ही स्ट्रेस और एंग्जायटी बढ़ने की संभावना भी देखी गई।

NeuroImage जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, अत्यधिक स्क्रॉलिंग दिमाग के ग्रे मैटर को भी प्रभावित कर सकती है। इसके कारण ईर्ष्या बढ़ना, जानकारी को धीरे प्रोसेस करना, निर्णय क्षमता में कमी और परिणामों को नजरअंदाज करने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
1. डोपामाइन का त्वरित रिलीज़
हर स्वाइप के बाद एक नया वीडियो तुरंत डोपामाइन रिलीज करता है। यह वही पैटर्न है जो किसी लत में देखा जाताहै। दिमाग इस “क्षणिक खुशी” का आदी हो जाता है और अधिक तेजी से उत्तेजना खोजने लगता है।
2. फोकस करने की क्षमता घट जाती है
चूंकि दिमाग हर कुछ सेकंड में नए वीडियो पर शिफ्ट होता है, उसकी गहरी फोकस करने की क्षमता कमजोर होने लगती है। इससे पढ़ाई, काम और निर्णय लेने पर असर पड़ता है।
3. इंपल्सिव और बेचैन व्यवहार
तेज़ रफ्तार वीडियो दिमाग को ओवरस्टिमुलेट कर देते हैं। इससे व्यक्ति जल्दी चिड़चिड़ा, इंपल्सिव और बेचैन होने लगता है।
4. नींद पर गंभीर असर
देर रात स्क्रॉलिंग नींद की गुणवत्ता गिरा देती है। ब्लू लाइट और लगातार उत्तेजनाएँ दिमाग को शांत नहीं होने देतीं। नतीजतन अगला दिन थकान, चिड़चिड़ापन और कम फोकस के साथ गुजरता है।
अक्सर लोग बोरियत, तनाव या अकेलेपन से बचने के लिए रील्स का सहारा लेते हैं। ऐसी स्थितियों में जर्नलिंग, दोस्त से बात करना या छोटी वॉक कहीं बेहतर विकल्प हो सकते हैं।
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रील्स देखना गलत नहीं है, लेकिन उनकी अधिकता दिमाग को ओवरस्टिमुलेट कर सकती है, जिससे फोकस, निर्णय क्षमता और इमोशनल हेल्थ पर नकारात्मक असर पड़ता है। संतुलन और सीमाएँ तय करके ही इस आदत के नुकसान से बचा जा सकता है।