
लाइफस्टाइल डेस्क। आजकल फैशन तेजी से बदलता है। सोशल मीडिया पर किसी सेलिब्रिटी का नया लुक दिखते ही वैसा ही आउटफिट खरीदने की इच्छा होने लगती है। ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म पर कम कीमत में नए डिजाइन मिल जाते हैं और कुछ ही दिनों में कपड़ों का ट्रेंड बदल जाता है। यही है फास्ट फैशन, जिसमें कम समय में बड़ी मात्रा में ट्रेंडी कपड़े तैयार किए जाते हैं, ताकि लोग उन्हें कम कीमत पर खरीद सकें। लेकिन इन कपड़ों की कीमत सिर्फ रुपये में नहीं चुकाई जाती। इनके उत्पादन से लेकर इस्तेमाल के बाद फेंके जाने तक पर्यावरण पर भी इसका असर पड़ता है।
फास्ट फैशन का मकसद नए ट्रेंड के हिसाब से कपड़े जल्दी तैयार करना और बाजार में उतारना है। पहले फैशन के ट्रेंड धीरे-धीरे बदलते थे, लेकिन अब सोशल मीडिया, इन्फ्लुएंसर्स और ऑनलाइन शॉपिंग ने इस प्रक्रिया को तेज कर दिया है। कई बार लोग जरूरत से ज्यादा कपड़े खरीद लेते हैं, क्योंकि कोई डिजाइन नया है या उसकी कीमत कम है।
इसका एक बड़ा नुकसान यह है कि कपड़ों की उपयोग अवधि घट सकती है। कुछ कपड़े कुछ ही बार पहनने के बाद अलमारी में पड़े रह जाते हैं या कचरे में पहुंच जाते हैं। यानी कपड़ा खरीदने और उसे लंबे समय तक इस्तेमाल करने के बीच का संबंध कमजोर होता जा रहा है।
कपड़े बनाने की प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों की जरूरत पड़ती है। खासकर सूती कपड़े के लिए कपास उगाने में पानी का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा कपड़े की रंगाई, धुलाई और फिनिशिंग में भी पानी और रसायनों की जरूरत पड़ सकती है। अगर औद्योगिक अपशिष्ट का सही तरीके से उपचार न किया जाए, तो ये रसायन नदियों और दूसरे जलस्रोतों को प्रदूषित कर सकते हैं।
कपड़ों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा भी पर्यावरण पर असर डालती है। अगर यह ऊर्जा कोयले, तेल या गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से आती है, तो ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ सकता है। इसके अलावा कच्चे माल को एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाने, कपड़े तैयार करने और फिर उन्हें बाजार तक भेजने में भी ऊर्जा खर्च होती है।
फास्ट फैशन में पॉलिएस्टर, नायलॉन और ऐक्रेलिक जैसे सिंथेटिक कपड़ों का इस्तेमाल आम है। ये पेट्रोलियम आधारित सामग्री से बनाए जाते हैं। ऐसे कपड़ों को धोने के दौरान बहुत छोटे प्लास्टिक के रेशे निकल सकते हैं, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। ये रेशे पानी के साथ जलस्रोतों तक पहुंच सकते हैं। हालांकि, इनका पर्यावरण पर कुल असर कपड़े के प्रकार, धुलाई के तरीके और अपशिष्ट जल के उपचार जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
एक और समस्या कपड़ों को फेंकने से जुड़ी है। प्राकृतिक रेशों से बने कपड़ों के मुकाबले कई सिंथेटिक कपड़े पर्यावरण में जल्दी विघटित नहीं होते। वहीं, अलग-अलग रेशों को मिलाकर बनाए गए कपड़ों को रिसाइकिल करना भी मुश्किल हो सकता है।
फास्ट फैशन का असर कम करने के लिए हर बार नए कपड़े खरीदना बंद करना जरूरी नहीं है। सबसे पहले खरीदारी से पहले यह देखना चाहिए कि कपड़े की वास्तव में जरूरत है या नहीं। अच्छी गुणवत्ता वाले कपड़े चुनना, उन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल करना और जरूरत पड़ने पर उनकी मरम्मत कराना उपयोगी कदम हो सकते हैं।
पुराने कपड़ों को फेंकने के बजाय उन्हें दोबारा पहनना, किसी और को देना या सही रिसाइक्लिंग व्यवस्था तक पहुंचाना भी बेहतर विकल्प है। सेकंडहैंड कपड़े खरीदना भी नए कपड़ों की मांग कम करने में मदद कर सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक पर्यावरणीय लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि इससे नए कपड़ों की खरीद कितनी कम होती है।
फास्ट फैशन की समस्या सिर्फ कपड़ों की नहीं, बल्कि उन्हें बनाने और इस्तेमाल करने के तरीके की भी है। ट्रेंड बदलते रहेंगे, लेकिन कपड़ों को जरूरत के मुताबिक खरीदना और लंबे समय तक इस्तेमाल करना पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम करने की दिशा में एक व्यावहारिक कदम है।
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