
लाइफस्टाइल डेस्क। एक ही उम्र, एक जैसी डिजिटल दुनिया और देश के भविष्य को लेकर उम्मीदें भी लगभग समान, लेकिन सरकार को देखने का नजरिया बिल्कुल अलग। भारत की Gen Z में राजनीतिक विचारों का यह अंतर सोशल मीडिया पर तेजी से दिखाई देता है। एक तरफ युवा बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महंगाई और संस्थाओं की जवाबदेही पर सवाल उठाते हैं। दूसरी तरफ कुछ युवा सरकार की नीतियों, विकास कार्यों, राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की वैश्विक छवि का बचाव करते नजर आते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही समूह इंटरनेट, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब वीडियो और ऑनलाइन चर्चाओं से प्रभावित होते हैं। फिर भी, एक ही घटना या सरकारी फैसले को लेकर उनकी राय अलग हो सकती है।
यह अंतर सिर्फ इस बात से नहीं समझा जा सकता कि कौन सरकार के पक्ष में है और कौन विपक्ष में। इसके पीछे युवाओं की आर्थिक परिस्थितियां, व्यक्तिगत अनुभव, राजनीतिक प्राथमिकताएं, परिवार का माहौल और उन्हें मिलने वाली जानकारी भी भूमिका निभा सकती है।
आज बहुत से युवाओं के लिए सोशल मीडिया राजनीतिक जानकारी हासिल करने का प्रमुख माध्यम है। इंस्टाग्राम पर छोटी वीडियो क्लिप, यूट्यूब पर लंबे इंटरव्यू और व्हाट्सऐप पर शेयर किए जाने वाले मैसेज राजनीतिक राय बनाने में भूमिका निभाते हैं। लेकिन हर युवा एक जैसा कंटेंट नहीं देखता।
जो युवा सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों, क्रिएटर्स या राजनीतिक टिप्पणीकारों को नियमित रूप से देखते हैं, उनका ध्यान बेरोजगारी, परीक्षा विवाद, महंगाई, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर अधिक जा सकता है।
इससे अलग, सरकार समर्थक कंटेंट देखने वाले युवाओं के सामने इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याणकारी योजनाओं, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति से जुड़ी बातें अधिक आ सकती हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि किसी एक तरह का कंटेंट देखने वाला हर व्यक्ति एक ही राय बनाएगा। लेकिन जब किसी यूजर के सामने बार-बार एक ही तरह के तर्क आते हैं, तो उसका नजरिया उस दिशा में मजबूत हो सकता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूजर की रुचि, देखे गए वीडियो, लाइक, शेयर और अन्य गतिविधियों के आधार पर कंटेंट की सिफारिश करते हैं। इससे किसी व्यक्ति को अपने विचारों से मिलती-जुलती सामग्री बार-बार दिखाई दे सकती है।
इसे समझने के लिए दो युवाओं का उदाहरण लें।
पहला युवा बेरोजगारी पर वीडियो देखता है। इसके बाद उसे भर्ती परीक्षाओं में देरी, नौकरी के अवसरों और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े और वीडियो दिखने लगते हैं। दूसरा युवा विकास परियोजनाओं पर वीडियो देखता है, तो उसे सड़क, रेलवे, सरकारी योजनाओं और राष्ट्रीय उपलब्धियों से जुड़ा कंटेंट अधिक मिल सकता है।
दोनों अपने-अपने फीड से देश की राजनीतिक स्थिति को समझने लगते हैं। कुछ समय बाद उन्हें लग सकता है कि उनके सामने मौजूद मुद्दे ही सबसे महत्वपूर्ण हैं।
युवाओं की राजनीतिक सोच को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि वे सरकार से सबसे ज्यादा उम्मीद क्या रखते हैं। एक युवा के लिए सरकारी नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाओं का समय पर आयोजन, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और रोजगार के अवसर सबसे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अगर उसे लगता है कि इन क्षेत्रों में उसकी उम्मीदें पूरी नहीं हुईं, तो वह सरकार से सवाल कर सकता है।
दूसरे युवा के लिए बेहतर सड़कें, रेलवे, डिजिटल सेवाएं, सरकारी योजनाओं का लाभ, राष्ट्रीय सुरक्षा या देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर उसे लगता है कि इन क्षेत्रों में सुधार हुआ है, तो वह सरकार के कामकाज का समर्थन कर सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात है- सरकार का समर्थक होना और उसकी हर नीति का समर्थन करना एक ही बात नहीं है। इसी तरह, सरकार की आलोचना करने का मतलब उसकी हर नीति का विरोध करना भी नहीं है।
लेकिन सोशल मीडिया की बहसों में अक्सर इन जटिल विचारों को दो खेमों में बांट दिया जाता है- सरकार समर्थक और सरकार विरोधी।
राजनीतिक सोच केवल इंटरनेट से नहीं बनती। परिवार में होने वाली बातचीत, स्कूल-कॉलेज का माहौल, दोस्तों की राय और किसी व्यक्ति के अपने अनुभव भी उसकी सोच को प्रभावित कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, किसी परिवार में सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिला हो, तो वहां सरकार के प्रति सकारात्मक राय बन सकती है। दूसरी ओर, किसी युवा को नौकरी पाने में परेशानी हुई हो या उसने भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं से जुड़ी खबरें देखी हों, तो वह रोजगार और जवाबदेही को लेकर अधिक सवाल कर सकता है।
इसी तरह, अलग-अलग राज्यों और शहरों में रहने वाले युवाओं के अनुभव भी अलग हो सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, स्थानीय रोजगार और सरकारी सेवाओं से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जबकि महानगरों में महंगाई, निजी क्षेत्र की नौकरियां, आवास और शिक्षा का खर्च प्राथमिकता बन सकते हैं।
सोशल मीडिया पर सरकार के समर्थकों और आलोचकों की आवाजें बहुत तेज सुनाई देती हैं। राजनीतिक बहसों में सक्रिय युवा वीडियो बनाते हैं, अपनी राय रखते हैं, हैशटैग चलाते हैं और दूसरे लोगों के तर्कों का जवाब देते हैं। लेकिन ऑनलाइन दिखाई देने वाली आवाजें पूरी युवा पीढ़ी की सोच का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।
बहुत से युवा ऐसे भी हो सकते हैं जो राजनीति में रुचि रखते हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से अपनी राय व्यक्त नहीं करते। कुछ लोग किसी पार्टी के बजाय मुद्दों के आधार पर अपना फैसला लेते हैं। वहीं, कुछ युवाओं की प्राथमिकता राजनीति से ज्यादा पढ़ाई, नौकरी या निजी जीवन हो सकती है।
इसलिए Gen Z को सिर्फ दो हिस्सों में बांटना उसकी विविधता को नजरअंदाज करना होगा।
Gen Z के राजनीतिक नजरिए में अंतर को समझने के लिए केवल यह देखना काफी नहीं है कि कौन सरकार के साथ है और कौन उसके खिलाफ। यह समझना भी जरूरी है कि युवा किस जानकारी के आधार पर राय बना रहे हैं।
क्या वे किसी दावे को मूल रिपोर्ट से जांचते हैं? क्या वे अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों को सुनते हैं? क्या वे अपनी पसंद के नेता या पार्टी की आलोचना को भी उसी कसौटी पर परखते हैं, जिस पर दूसरे पक्ष को परखते हैं?
ये सवाल राजनीतिक समर्थन से अलग हैं। इनका संबंध सूचना को समझने, प्रमाणों का मूल्यांकन करने और असहमति के बीच बातचीत जारी रखने की क्षमता से है। भारत की Gen Z को एक ही राजनीतिक पहचान में समेटना मुश्किल है। इस पीढ़ी के भीतर विकास, रोजगार, अधिकार, राष्ट्रीय पहचान और शासन को लेकर अलग-अलग अपेक्षाएं मौजूद हैं।
आखिरकार, युवा पीढ़ी के बीच राजनीतिक अंतर को सिर्फ सरकार के समर्थन या विरोध के रूप में नहीं, बल्कि उनकी प्राथमिकताओं, अनुभवों और सूचना के स्रोतों के संदर्भ में समझने की जरूरत है। सोशल मीडिया इस अंतर को ज्यादा दिखाई देने वाला बना सकता है, लेकिन किसी युवा की पूरी राजनीतिक सोच को केवल उसके ऑनलाइन फीड या एक राजनीतिक पोस्ट से नहीं समझा जा सकता।
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