
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मानसून का मौसम पौधारोपण के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। वर्षा के कारण मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती है, जिससे नए पौधों की जड़ों को विकसित होने में मदद मिलती है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि केवल पौधे लगा देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी नियमित देखभाल, संरक्षण और सही प्रबंधन भी उतना ही आवश्यक है। यदि पौधों की उचित देखरेख नहीं की जाए तो बड़े पैमाने पर किए गए पौधारोपण अभियानों का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
पर्यावरणविदों के अनुसार पौधारोपण के दौरान ऐसी प्रजातियों का चयन किया जाना चाहिए जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ पक्षियों और अन्य जीवों के लिए भी उपयोगी हों। ऐसे पौधे न केवल हरियाली बढ़ाते हैं, बल्कि स्थानीय जैव विविधता को भी समृद्ध करते हैं।
सड़क किनारे और खुले क्षेत्रों में प्राइड आफ इंडिया (जरुल) तथा सिल्वर ओक जैसे पौधे लगाए जा सकते हैं। प्राइड ऑफ इंडिया अपने आकर्षक नीले-बैंगनी फूलों के कारण शहर की सुंदरता बढ़ाता है, जबकि सिल्वर ओक की पत्तियां विशेष रूप से रात के समय चांदी जैसी चमक लिए दिखाई देती हैं, जो इसे एक आकर्षक वृक्ष बनाती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि छायादार और सदाबहार वृक्षों की श्रेणी में मौलश्री एक उत्कृष्ट विकल्प है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें पत्तियों का झड़ना बहुत कम होता है, जिससे आसपास का वातावरण स्वच्छ और हराभरा बना रहता है।
सीता अशोक, महानीम, ऑस्ट्रेलियन बबूल, नीम, बरगद और गूलर जैसे वृक्ष भी पौधारोपण के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। इन वृक्षों से न केवल पर्यावरण को लाभ मिलता है, बल्कि कई प्रजातियों के पक्षियों, गिलहरियों और अन्य जीवों को भोजन तथा सुरक्षित आश्रय भी प्राप्त होता है।
पर्यावरणविद डॉ. एच.बी. पालन का कहना है कि शहरी क्षेत्रों में पौधारोपण करते समय उपलब्ध स्थान और बिजली की लाइनों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। अक्सर बिना योजना के लगाए गए बड़े वृक्ष बाद में विद्युत तारों से टकराने लगते हैं, जिसके कारण उनकी शाखाओं की कटाई करनी पड़ती है। इससे वृक्षों का प्राकृतिक विकास प्रभावित होता है।
जिन स्थानों पर बिजली की लाइनें गुजरती हैं, वहां कम ऊंचाई वाले पौधे जैसे अमलतास, बेल और आंवला लगाए जाने चाहिए। इससे भविष्य में पेड़ों की अनावश्यक कटाई की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और हरियाली भी सुरक्षित रहेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार पौधारोपण से पहले गड्ढों की उचित तैयारी करना अत्यंत आवश्यक है। सागौन और अन्य मिश्रित प्रजातियों के पौधों के लिए सामान्यतः 30×30 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे पर्याप्त होते हैं, जबकि बांस और फलदार पौधों के लिए 45×45 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे अधिक उपयुक्त माने जाते हैं।
पौधे लगाने से पहले मिट्टी में मौजूद पत्थर, प्लास्टिक और अन्य अवांछित पदार्थों को हटाना चाहिए। इससे पौधों की जड़ों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है। साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए उसमें सड़ी हुई गोबर खाद या अन्य जैविक खाद मिलाना लाभदायक होता है। जैविक खाद पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करती है और उनकी वृद्धि को बेहतर बनाती है।
पौधारोपण के बाद पौधों की सुरक्षा के लिए ट्री-गार्ड या अन्य सुरक्षा उपाय अपनाने चाहिए, ताकि पशुओं या अन्य कारणों से उन्हें नुकसान न पहुंचे। शुरुआती महीनों में नियमित निगरानी, खरपतवार की सफाई और आवश्यकतानुसार सिंचाई भी जरूरी होती है।
यदि पौधारोपण विज्ञानी तरीके से किया जाए और पौधों की नियमित देखभाल सुनिश्चित की जाए, तो यह अभियान केवल हरियाली बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा।
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