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क्यों सर्दियों में ही इतनी खास होती है ग्वालियर की गजक? इसके पीछे छिपी पुरानी परंपरा

ग्वालियर में सर्दियां आते ही तिल और गुड़ से बनी कुरकुरी गजक बाजारों में सज जाती है। यह मौसम, त्योहार और पुरानी खानपान परंपरा से जुड़ी है। इसकी खासियत बनाने का पारंपरिक तरीका है, हालांकि इसे सीमित मात्रा में खाना बेहतर है।

By Digital DeskEdited By: Akriti kumari
Publish Date: Thu, 05 Nov 2026 02:14:44 PM (IST)Updated Date: Thu, 05 Nov 2026 02:14:44 PM (IST)
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क्यों सर्दियों में ही इतनी खास होती है ग्वालियर की गजक? इसके पीछे छिपी पुरानी परंपरा

HighLights

  1. सर्दियों की खास मिठाई है गजक
  2. तिल-गुड़ का पारंपरिक मेल
  3. मुरैना की गजक की भी अलग पहचान

लाइफस्टाइल डेस्क। सर्दियों में बाजारों में एक खास मिठाई की खुशबू लोगों को अपनी ओर खींचने लगती है। दुकानों पर तिल और गुड़ से बनी कुरकुरी गजक सज जाती है। कोई इसे चाय के साथ खाना पसंद करता है, तो कोई घर आए मेहमानों को इसका डिब्बा देकर स्वागत करता है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर और आसपास के इलाकों में तो गजक सर्दियों के खानपान का खास हिस्सा बन जाती है।

लेकिन सवाल है कि आखिर गजक को सर्दियों की मिठाई ही क्यों माना जाता है? तिल और गुड़ का मेल ठंड के मौसम में इतना लोकप्रिय कैसे हुआ? इसके पीछे स्वाद, मौसम और खानपान की पुरानी परंपरा का दिलचस्प रिश्ता है।


तिल और गुड़ का मेल, सर्दियों की पसंद

गजक बनाने में मुख्य रूप से तिल और गुड़ का इस्तेमाल होता है। तिल में फैट, प्रोटीन, फाइबर और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। वहीं गुड़ में मुख्य रूप से शुगर होती है, जिससे शरीर को ऊर्जा मिलती है। यही वजह है कि सर्दियों में तिल और गुड़ से बनी चीजें कई इलाकों के पारंपरिक खानपान का हिस्सा रही हैं।

मकर संक्रांति और लोहड़ी जैसे त्योहारों पर भी तिल-गुड़ से बनी मिठाइयां खाने और बांटने की परंपरा है। महाराष्ट्र में तिलगुल, उत्तर भारत में तिल के लड्डू और मध्य भारत में गजक-रेवड़ी इसी मौसमी खानपान की मिसाल हैं।

हालांकि, तिल और गुड़ खाने से सर्दी-जुकाम या दूसरी मौसमी बीमारियों से बचाव होने का पक्का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। गजक को स्वाद और ऊर्जा देने वाली मिठाई के तौर पर देखना ज्यादा सही है। इसमें शुगर और कैलोरी भी होती है, इसलिए इसे सीमित मात्रा में खाना बेहतर है।

ग्वालियर की गजक की पहचान सिर्फ स्वाद नहीं, बनाने का तरीका भी है

गजक की खासियत उसके कुरकुरेपन और पतली परतों में छिपी होती है। इसे बनाने के लिए पहले तिल को साफ करके भूना जाता है। दूसरी ओर गुड़ या चीनी की चाशनी तैयार की जाती है। इसके बाद दोनों को मिलाकर मिश्रण को लगातार खींचने, मोड़ने और कूटने जैसी प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है।

यही वह काम है जिसमें कारीगरों का अनुभव सबसे ज्यादा मायने रखता है। चाशनी कितनी पकी है, मिश्रण को कितनी देर तक कूटना है और उसे किस समय आकार देना है, इन बातों से गजक का खस्तापन तय होता है। हर तरह की गजक बनाने का तरीका एक जैसा नहीं होता, लेकिन पारंपरिक खस्ता गजक में कारीगरी की अहम भूमिका होती है।

ग्वालियर की नई सड़क और आसपास के बाजारों में गजक की दुकानों की अपनी पहचान है। यहां की दुकानों पर कई तरह की गजक मिलती हैं। सादी तिल वाली गजक के अलावा मूंगफली, ड्राई फ्रूट्स और दूसरी चीजों से बनी किस्में भी लोगों को पसंद आती हैं।

ग्वालियर और मुरैना की गजक का क्या है रिश्ता?

ग्वालियर की गजक की चर्चा करते समय मुरैना का नाम लेना भी जरूरी है। मुरैना की गजक को इस इलाके की खास पहचान माना जाता है। मध्य प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग ने भी मुरैना की गजक को राज्य के सर्दियों के खास खानपान में शामिल किया है।

मुरैना की गजक की पहचान उसके कुरकुरेपन और पारंपरिक तरीके से तैयार करने के लिए है। इसकी लोकप्रियता ग्वालियर तक ही सीमित नहीं रही। ग्वालियर की कई दुकानों पर भी मुरैना की गजक मिलती है और लोग इसे दूसरे शहरों में अपने साथ ले जाना पसंद करते हैं।

मुरैना जिले की आधिकारिक वेबसाइट पर भी गजक का जिक्र है। वहां इसकी तैयारी में लगने वाले समय और तिल-गुड़ के मिश्रण को कूटने की प्रक्रिया के बारे में बताया गया है। यही वजह है कि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में गजक सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि स्थानीय खानपान और कारीगरी की पहचान बन चुकी है।

सर्दियों में गजक का स्वाद इसलिए भी खास लगता है क्योंकि यह मौसम, त्योहार और पुरानी खानपान की आदतों से जुड़ी हुई है। ठंड की शाम में चाय के साथ कुरकुरी गजक का एक टुकड़ा हो, तो स्वाद के साथ बचपन और घर की यादें भी ताजा हो जाती हैं।

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