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History of Bhopal: नवाब हमीदुल्लाह ने बेगम आफताबजहां को तोहफे में दी थी रियाज़ मंज़िल

रियाज़ मंजिल का नाम शायद नई पीढ़ी के लिए अनजाना हो, लेकिन दीवारों से जुड़ी दास्तान बताती है। कभी भोपाल की हवेलियां और महल सिर्फ रहने की जगह नहीं थे वे...और पढ़ें

By Abrar KhanEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Fri, 11 Sep 2026 11:54:51 AM (IST)Updated Date: Fri, 11 Sep 2026 04:40:55 PM (IST)
History of Bhopal: नवाब हमीदुल्लाह ने बेगम आफताबजहां को तोहफे में दी थी रियाज़ मंज़िल
भोपाल की रियाज़ मंज़िल।

HighLights

  1. यहां शायर अल्लामा इकबाल और सैय्यद खां के पोते भी ठहरे थे।
  2. परिवारजन इस संबंध में कोई बात नहीं करना चाहते वे कहते हैं।
  3. यह विवाद अभी अदालत में है हमें इस बारे में कुछ नहीं कहना है।

मोहम्मद अबरार खान, नवदुनिया। भोपाल के बड़ा तालाब किनारे खानूगांव पहाड़ी पर मौजूद रियाज़ मंजिल इस जगह बनने वाली सबसे पहली इमारत थी इसके बाद धीरे धीरे यहां घनी आबादी बन गई है। इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है कारण है सरकार और नवाब के वारिषों के बीच मालिकाना हक हक।

रियाज मंजिल को 1949 में नवाब हमीदुल्लाह खान ने अपनी बेगम आफताब जहां को इनायतनामे के जरिए तोहफे में दी थी।

इसकी कहानी 1949 के इनायतनामे से शुरू होकर 1956 की सरकारी जांच, 1960 के उत्तराधिकार विवाद, 2015 की शत्रु संपत्ति कार्रवाई, 2022 की आफताब जहां की संपत्तियों पर सीइपीआई कार्रवाई और 2026 की नई प्रशासनिक जांच तक पहुंची है।

परिवारजन इस संबंध में कोई बात नहीं करना चाहते वे कहते हैं यह विवाद अभी अदालत में है हमें इस बारे में कुछ नहीं कहना है।

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उर्दू अदब के इतिहास का भी अहम पड़ाव

  • इतिहास के पन्नों में यह केवल एक नवाबी इमारत नहीं, बल्कि उर्दू अदब के इतिहास का भी अहम पड़ाव है। रियाज का शाब्दिक अर्थ होता है अभ्यास लेखन चिंतन और गायन वादन में रियाज का बड़ा महत्व है।
  • नवाब अपने खास मेहमानों को इसी रियाज मंजिल में ठहराया करते थे। इसी क्रम में 1935 में शायर डॉ. अल्लामा इकबाल अपने भोपाल प्रवास के दौरान यहीं ठहरे थे।
  • यहां उनकी मुलाकात सर सैयद अहमद खान के पोते सर रॉस मसूद से हुई वे भी उन दिनों यहीं रहते थे। इकबाल ने इस प्रवास के दौरान अपनी मशहूर किताब ‘जर्ब-ए-कलीम’ के लिए कई नज़्में यहीं लिखीं थीं।
  • नवाब हमीदुल्लाह खान ने इकबाल की साहित्यिक प्रतिभा का सम्मान करते हुए उन्हें 500 रुपये प्रतिमाह की जीवनवृत्ति भी दी थी।
  • रियाज़ मंजिल का नाम शायद नई पीढ़ी के लिए अनजाना हो, लेकिन दीवारों से जुड़ी दास्तान बताती है।
  • कभी भोपाल की हवेलियां और महल सिर्फ रहने की जगह नहीं थे वे इल्म, अदब, इलाज और विचारों के भी ठिकाने हुआ करते थे।