
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। उपलब्ध साधनों से जन्मा एक व्यंजन किसी दिन समाज विशेष की पहचान का हिस्सा बन जाएगा, यह तो शायद उसका ईजाद करने वाले ने भी नहीं सोचा होगा। दिलचस्प बात तो यह है कि वह व्यंजन एक पकवान की श्रेणी में आ गया। वक्त बदला और यह पकवान सुबह के नाश्ते का अहम हिस्सा बना और अब तो रोजगार का जरिया भी बन गया है।
यहां जिक्र हो रहा है ‘दाल पकवान’ का जो सिंध से भारत में आकर न केवल बसा बल्कि सभी की जुबां पर भी चढ़ गया। इंदौरमें जहां दिन की शुरुआत पोहा-जलेबी से होती है तो वहीं, दाल पकवान भी खूब खाया-खिलाया जाने लगा है। स्वाद और सेहत का यह नपातुला ‘काम्बिनेशन’ कभी शहर के केवल सिंधी बहुल क्षेत्र में ही इक्का-दुक्का ठेलों पर मिलता था पर अब यह शहर के अन्य भागों में भी मिलने लगा है।
सादगी लिए यह दाल पकवान अब ‘फेसिनेट’ नाश्ता भी बनता जा रहा है तभी तो युवा भी इसके कद्रदान हो चले हैं। शहर की दो युवतियां मयूरी धोलपुरे और उर्वशी गौसर ने इसे सिंधी बहुल क्षेत्र से निकालकर शहर के उस भाग में पहुंचाया, जहां दाल-बाफला, दाल-पानिया के रेस्टोरेंट अपनी पैठ बना चुके हैं। दशहरा मैदान के बाहर हर दिन ये दोनों ‘कजिन’ सुबह दाल पकवान परोसती हैं, जिसे स्वाद के शौकीन बड़े चाव से खाते हैं।
मयूरी बताती हैं कि दाल पकवान के लिए बनने वाला खस्ता भी यह घर पर ही बनाती हैं। खस्ता में मैदा, सूजी, अजवाइन, सोड़ा, मोयन से तैयार की जाती है। जहां तक बात दाल की है तो उसके लिए मूंग की छिलके वाली और मूंग की धुली हुई दाल दोनों का ही उपयोग किया जाता है। नमक-हल्दी डालकर दाल पकाई जाती है और खस्ता पर यह दाल डाली जाती है। इसके बाद इस पर धनिया, पोदिना और इमली की चटनी डाली जाती है।
इसके स्वाद को बढ़ाने के लिए कई मसालों का उपयोग किया जाता है। इसमें जीरा पाउडर, काली मिर्च पाउडर, चाट मसाला, लाल मिर्च पाउडर डाला जाता है। इसके साथ बारिक कटा प्याज और हरी मिर्च दी जाती है। मयूरी बताती हैं कि उन्हें बचपन से ही दाल-पकवान पसंद था और जब बात अपना कुछ कार्य करने की आई तो पसंद को ही रोजगार के रूप में चुना और दाल-पकवान की दुकान लगाना शुरू कर दी।
पढ़ाई पूरी करने के बाद हम दोनों बहनों ने यह कार्य किया और इसके साथ कोशिश यह भी की कि लोगों को सेहतमंद व स्वादिष्ट व्यंजन परोसा जाए जो ‘इजी टू कुक’ और ‘इजी टू डायजेस्ट’ की शर्त को भी पूरा करता हो।